पितृपक्ष के अंतिम दिन शनिवार 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर संगम तट सहित गंगा-यमुना के घाटों पर श्रद्धालुओं ने स्नान, तर्पण और पिंडदान कर अपने पूर्वजों का स्मरण किया।
पितृपक्ष के अंतिम दिन शनिवार 10 अक्तूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर संगम तट सहित गंगा-यमुना के घाटों पर श्रद्धालुओं ने स्नान, तर्पण और पिंडदान कर अपने पूर्वजों का स्मरण किया। महालया अमावस्या के अवसर पर तीर्थ पुरोहितों के मार्गदर्शन में विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किए गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध किया।
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महालया अमावस्या का विशेष मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि नौ अक्तूबर की रात 9:35 बजे से शुरू होकर 10 अक्तूबर की रात 9:19 बजे तक रहेगी। श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त सुबह 11:45 से दोपहर 12:31 बजे तक, रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:31 से 1:18 बजे तक और अपराह्न काल 1:18 से 3:37 बजे तक है। विशेष मुहुर्त में लोगों ने अपने पितरों का आह्वान कर उनको तर्पण किया।
दूध, खोवा, तिल और जौ के आटे से पिंडदान
पिंडदान में परंपरा के अनुसार चावल या जौ के आटे, दूध, खोवा, काले तिल, घी, शहद और गुड़ का प्रयोग किया जाता है। कुछ परंपराओं में पके चावल से भी पिंड बनाए जाते हैं। कुश, जल, गंगाजल, सफेद फूल और अक्षत का उपयोग तर्पण तथा पूजन में होता है। सामग्री और विधि में परिवार की परंपरा तथा तीर्थ पुरोहित के निर्देश के अनुसार अंतर हो सकता है।
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क्या है सर्वपितृ अमावस्या का महत्व?
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या और महालया अमावस्या भी कहा जाता है। यह पितृपक्ष का अंतिम दिन है। मान्यता है कि इस दिन उन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। इस दिन तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा है।