यह विदेशी किशोर संन्यासी बनकर कल्पवासियों के बीच की कठिन जीवन शैली से लेकर नागाओं के धूना रमाने की साधना तक को करीब से जानने का प्रयास कर रहे हैं। सेक्टर-19 के अपने शिविर में दिमित्रो चार बजे भोर में ही उठ जाते हैं। वह रिक्शे से हर रोज प्रात: संगम स्नान के बाद सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर पूजा करते हैं। वह बताते हैं कि कल्पवास कर रहे पड़ोस के ही देवरिया निवासी रामायण तिवारी से वह पूजा पद्धति सीख रहे हैं, ताकि वतन लौटने के बाद भी वह जीवन के इस अनुशासन से बंधे रहें। इसी अमेरिका के न्यूयार्क निवासी उद्यमी एडम्मा के पुत्र 15 वर्षीय पुत्र लियाम ने भी महाकुंभ में सनातन धर्म अपना लिया है।
जींस, कोट-पैंट में न्यूयार्क से आए लियाम ने अब सफेद धोती पहनने, लपेटने के साथ ही रामनामी ओढ़कर ध्यान और प्रभु का नाम जप शुरू कर दिया है। लियाम ने संगम पर केश मुंडन कराकर मोटी चोटी भी रख ली है। वह भी हर रोज रिक्शे से संगम में डुबकी लगाने जाते हैं। वह दुर्गा चालीसा, हनुमान चालीसा याद करने के साथ ही वेद पाठ का अभ्यास कर रहे हैं। इसी तरह जापान की महामंडलेश्वर केको आईकावा उर्फ कैला माता के शिविर में रूस, जापान और नेपाल के बालक और किशोर संन्यासी के वेश में ध्यान-साधना में रम गए हैं।
जूना अखाड़े के महंतों, महामंडलेश्वरों के शिविरों में 50 से अधिक विदेशी बालक और किशोर संन्यासी बनकर ध्यान-साधना कर रहे हैं। ऐसे कई किशोर संन्यासी बनने के बाद तीन पहर गंगा स्नान भी कर रहे हैं। - महंत स्वामी विद्यानंद गिरि, पंचदशनाम जूना अखाड़ा।