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Mahakumbh : अमेरिका-रूस तक सनातन का डंका, विदेशी किशोरों में छाया संन्यास का क्रेज

Mon, 20 Jan 2025 05:45 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)

सार

संगम की रेती पर अमेरिका, रूस और जर्मनी के कई बालकों और किशोरों ने सनातन से प्रभावित होकर अपनी संस्कृति और संस्कार दोनों बदल दिया है। ऐसे किशोर संगम की रेती पर माथे पर तिलक, सिर पर मोटी चोटी और धोती-रामनामी ओढ़कर प्रभु श्रीराम, भगवान शिव और कृष्ण को समझने का प्रयास कर रहे हैं।
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संगम में डुबकी लगाकर रिक्शे से अपने गुरु के साथ शिविर में लौटते रूस के दिमित्रों। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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सनातन धर्म का डंका सात समंदर पार तक किस तरह बज रहा है, इसका विश्व समुदाय के सामने जीता-जागता उदाहरण महाकुंभ में आए बाल और किशोर संन्यासी प्रस्तुत कर रहे हैं। संगम की रेती पर अमेरिका, रूस और जर्मनी के कई बालकों और किशोरों ने सनातन से प्रभावित होकर अपनी संस्कृति और संस्कार दोनों बदल दिया है। ऐसे किशोर संगम की रेती पर माथे पर तिलक, सिर पर मोटी चोटी और धोती-रामनामी ओढ़कर प्रभु श्रीराम, भगवान शिव और कृष्ण को समझने का प्रयास कर रहे हैं।

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यूक्रेन के साथ तीन साल से युद्धरत रूस की राजधानी मास्को से आए दिमित्रो और डेनयिल संन्यास धारण कर संगम की रेती पर कड़ाके की ठंड में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती की पावन त्रिवेणी में डुबकी लगाकर वेद की ऋचाओं का पाठ कर रहे हैं। वह संतों के सानिध्य में देव भाषा संस्कृत भी सीख रहे हैं, ताकि वेद के श्लोकों का शुद्ध उच्चारण कर सकें। 11 वर्षीय दिमित्रो और 13 वर्षीय डेनियल ही नहीं ऐसे 50 से अधिक विदेशी बालक और किशोर महाकुंभ के दो स्नान पर्व बीतने तक सनातन संस्कृति को पूरी तरह अपना कर संन्यासी बन चुके हैं।

यह विदेशी किशोर संन्यासी बनकर कल्पवासियों के बीच की कठिन जीवन शैली से लेकर नागाओं के धूना रमाने की साधना तक को करीब से जानने का प्रयास कर रहे हैं। सेक्टर-19 के अपने शिविर में दिमित्रो चार बजे भोर में ही उठ जाते हैं। वह रिक्शे से हर रोज प्रात: संगम स्नान के बाद सूर्य भगवान को अर्घ्य देकर पूजा करते हैं। वह बताते हैं कि कल्पवास कर रहे पड़ोस के ही देवरिया निवासी रामायण तिवारी से वह पूजा पद्धति सीख रहे हैं, ताकि वतन लौटने के बाद भी वह जीवन के इस अनुशासन से बंधे रहें। इसी अमेरिका के न्यूयार्क निवासी उद्यमी एडम्मा के पुत्र 15 वर्षीय पुत्र लियाम ने भी महाकुंभ में सनातन धर्म अपना लिया है।

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जींस, कोट-पैंट में न्यूयार्क से आए लियाम ने अब सफेद धोती पहनने, लपेटने के साथ ही रामनामी ओढ़कर ध्यान और प्रभु का नाम जप शुरू कर दिया है। लियाम ने संगम पर केश मुंडन कराकर मोटी चोटी भी रख ली है। वह भी हर रोज रिक्शे से संगम में डुबकी लगाने जाते हैं। वह दुर्गा चालीसा, हनुमान चालीसा याद करने के साथ ही वेद पाठ का अभ्यास कर रहे हैं। इसी तरह जापान की महामंडलेश्वर केको आईकावा उर्फ कैला माता के शिविर में रूस, जापान और नेपाल के बालक और किशोर संन्यासी के वेश में ध्यान-साधना में रम गए हैं।

जूना अखाड़े के महंतों, महामंडलेश्वरों के शिविरों में 50 से अधिक विदेशी बालक और किशोर संन्यासी बनकर ध्यान-साधना कर रहे हैं। ऐसे कई किशोर संन्यासी बनने के बाद तीन पहर गंगा स्नान भी कर रहे हैं। - महंत स्वामी विद्यानंद गिरि, पंचदशनाम जूना अखाड़ा।

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