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सुरक्षा, स्वास्थ्य की चिंता छोड़ खडे़ किए मोबाइल टॉवर

Fri, 22 Jan 2016 12:16 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/इलाहाबाद
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मोबाइल कंपनियों ने शहर में टॉवर लगाने के दौरान सुरक्षा और लोगों के स्वास्थ्य की चिंता नहीं की। भारी-भरकम मोबाइल टावर घनी आबादी वाले मोहल्लों में पुरानी और कमजोर इमारतों की छत पर लगा दिए। एक  से दूसरे मोबाइल टॉवर के बीच दूरी के बारे में भी नहीं सोचा गया। कई जगह 50-60 मीटर की दूरी पर दो-दो टॉवर लगा दिए गए। इनसे होने वाले रेडिएशन और उससे आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी कंपनियों ने कोई चिंता नहीं की। जिन इमारतों में टॉवर लगने हैं, उनके मालिकों ने भी मोटा किराया मिलने के लालच में मानकों की तिलांजलि दे दी। अब हाईकोर्ट ने इनसे होने वाले रेडिएशन, एक से दूसरे टॉवर के बीच की दूरी आदि पर जवाब मांगा तो मोबाइल कंपनियों में हड़कंप मच गया है।
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इमारतों में मोबाइल टॉवर लगाने के पहले एडीए से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए स्वीकृत मानचित्र के साथ स्ट्रक्चरल सार्टिफिकेट लेना होता है। इसके बाद ही टॉवर लगाने की अनुमति दी जाती है। इसके लिए एडीए में तय रकम भी जमा करनी होती है। करीब 20 वर्ष में शहर के हर मोहल्ले में मोबाइल टॉवर लग गए। वर्तमान में इनकी संख्या तकरीबन 400 है, लेकिन कई टॉवर ऐसी इमारतों में लगे हैं, जो बेहद घनी आबादी के बीच में होने के साथ काफी पुराने हैं।
चौक स्थित मीरगंज गली, भारती भवन, बताशा मंडी, अतरसुइया गली, जॉनसेनगंज, नखास कोहना, मुट्ठीगंज, खुल्दाबाद, कीडगंज, कटरा, दारागंज में ऐसे कई मकान हैं जिनकी छतों पर टॉवर लगे हैं। इनमें से ज्यादातर मकान 30-40 वर्ष या उससे अधिक पुराने हैं। इन मोहल्लों में कई टावरों की दूरी एक-दूसरे से काफी कम भी है। गर्मी के दिनों में तेज आंधी के दौरान इन टॉवर के गिरने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा कम तीव्रता के भूकंप में भी टॉवर गिरने का खतरा बना रहता है।
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‘मोबाइल टॉवर से होने वाले रेडिएशन से स्वस्थ्य को लेकर कई तरह का खतरे होते हैं। इसका असर लंबे समय बाद दिखता है। रेडिएशन का असर दिमाग, हृदय, और त्वचा पर पड़ता है। इससे त्वचा के कैंसर की आशंका भी रहती है। इसके अलावा तनाव, उलझन जैसी समस्याएं भी बनी रहती हैं।’ डॉ.एनएन गोपाल, एसआरएन
‘मोबाइल टॉवर के संबंध में वर्ष 1998 में शासनादेश हुआ था कि इसके लिए विकास प्राधिकरण से अनुमति की जरूरत नहीं हैं। बाद में वर्ष 2008 में भवन निर्माण एवं विकास उपविधि में मानक तय हुए, लेकिन इसके पहले तक काफी मोबाइल टॉवर लग चुके थे। घनी आबादी वाले मोहल्लों में भी उसी दौरान टॉवर लगे। एडीए के मानकों के तहत जिस इमारत पर टॉवर लग रहा है, उसका नक्शा स्वीकृत हो, इमारत मजबूत होने के साथ टॉवर लगाने के लिए स्ट्रक्चरल सार्टिफिकेट अनिवार्य है।’ सत शुक्ला, नोडल अधिकारी एडीए
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