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शीशम की पत्तियों में है हड्डी जोड़ने की ताकत

Sun, 21 Feb 2016 01:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/इलाहाबाद
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अब टूटी हड्डी को जुड़ने में तीन महीने नहीं लगेंगे। मात्र डेढ़ महीने में हड्डी जुड़ जाएगी। वह भी पहले से मजबूत। इतना ही नहीं सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीडीआरआई) के वैज्ञानिकों ने ऐसी दवा बनाई है जिनके सेवन से कमजोर हड्डियों को भी मजबूती मिलेगी। गौर करने वाली बात यह है कि यह दवा शीशम की पत्ती से बनाई गई। वैज्ञानिकों का दावा है कि इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। सभी स्तर पर इसके प्रयोग सफल पाए गए हैं। अब यह दवा बाजार में भी आ गई है।
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भारतीय विज्ञान कांग्रेस की ओर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के सहयोग से बॉटनी के सभागार में ‘भारत में देशज विकास हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में दूसरे दिन सीडीआरआई के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.राकेश मौर्या ने बताया कि शीशम की पत्तियों में पॉलीफिनॉल ग्लाइकोसाइट नामक कंपाउंड पाया जाता है। इस यौगिक की खोज संस्थान की प्रीति दीक्षित ने की। प्रीति अब कोठारी फेलोशिप के अंतर्गत इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर जगदम्बा सिंह के निर्देशन में रिसर्च कर रही हैं। 
डॉ.राकेश ने बताया कि  पॉलीफिनाल ग्लाइकोसाइट की मदद से रीयूनियन और यूनियन एडवांस्ड नामक दवा बनाई गई है। 20 मरीजों पर इनके क्लिनिकल ट्रालय भी हो चुके हैं। दुर्घटना में इनकी हड्डियां कई जगह टूट गई थीं। इन दवाओं का काफी सकारात्मक प्रभाव सामने आया। मात्र डेढ़ महीने में हड्डी पूरी तरह से जुड़ गई। जबकि, आमतौर पर तीन महीने लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि सीडीआरआई की अभी तक तीन दवाएं बाजार में आई हैं। यह दवा भी 12 साल के अंतराल पर आई है। उन्होंने बताया कि ढाक पेड़ की छाल से भी जेडबोन नाम से इसी तरह की दवा तैयार की जा रही है। इसका क्लिनिकल ट्रायल चल रहा है।
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मुख्य अतिथि कांग्रेस के जनरल प्रसिडेंट डॉ.एके सक्सेना ने विज्ञान के लाभ को अति पिछड़े इलाके के लोगों तक पहुंचाने की अपील की। प्रोफेसर ए.सत्यनारायण ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। अलग-अलग सत्र में एक दर्जन से अधिक शोधपत्र पढ़े गए। वैज्ञानिकों ने तकनीकी पहलुओं के अलावा नवीनतम खोजों के बारे में भी जानकारी दी। विज्ञान के विभिन्न विषयों पर प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। इससे पहले संयोजक प्रोफेसर आईआर सिद्दीकी ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम के संयोजक प्रोफेसर आरकेपी सिंह ने कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताया। प्रोफेसर गीता वातल ने संचालन तथा प्रोफेसर डीके चौहान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 
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