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राह दिखाती हैं भारतेंदु की रचनाएं

Thu, 10 Sep 2015 01:39 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। समानांतर संस्था के समानांतर-38 समारोह में बुधवार को भारतेंदु हरिश्चंद्र की जयंती पर ‘भारतेंदु की प्रासंगिकता’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में हुआ। इसी के साथ समानांतर का चार दिनी आयोजन भी खत्म हो गया। कार्यक्रम में भारतेंदु की जीवन, रंगमंडली द्वारा नाट्य प्रदर्शनों के छायाचित्रों के साथ पारिवारिक और जीवन प्रसंगों पर केंद्रित फोटो प्रदर्शनी लगाई गई।
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कार्यक्रम अध्यक्ष हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. मुश्ताक अली ने कहा कि भारतेंदु ने अपने समय के अंधेरे को समझा और अंधेर नगरी की रचना की। हमारे समय का अंधेरा क्या है, इसकी पड़ताल हमें करते रहना चाहिए। भारतेंदु की रचनाएं हमें जाग्रत ही नहीं करतीं बल्कि एक मार्ग भी दिखाती हैं। प्रो. प्रणय कृष्ण ने कहा कि हिन्दी का आधुनिक युग नाटकों से ही शुरू होता है। आदिकाल और मध्य काल में नाटक नहीं मिलते हैं। भारतेंदु ने अपने समय को पहचान कर भारत दुर्दशा और अंधेर नगरी जैसी कृतियों की रचना की। पराधीन होते हुए भी वह जीवंतता के साथ रचते थे। डॉ. अनुपम आनंद ने कहा कि अंधेर नगरी में भाषा और बोली के स्तर पर जो असाधारण प्रयोग हुआ वह अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता।

डॉ. सुधांशु मालवीय ने कहा कि आज के रंगकर्मियों को भारतेंदु से सीखना चाहिए। उनका हर लेखन देश को जगाने के लिए होता था। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सूर्य नारायण ने किया। अतिथियों का स्वागत संस्था अध्यक्ष प्रो. अनीता गोपेश और धन्यवाद ज्ञापन सचिव अनिल रंजन भौमिक ने किया। इस दौरान डॉ. श्रीरंजन शुक्ल, राम बहादुर, झरना मालवीय, अच्छे लाल यादव, वीके बिंदल, अंशुमान, सुमन शुक्ला, सुनीता, भीष्मक श्रीवास्तव, धीरज गुप्ता समेत काफी संख्या में लोग मौजूद रहे।
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मंजिल संस्था की ओर से मलिन बस्ती में ‘पेड़ों को जीने दो’ नाटक का मंचन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। पूजा श्रीवास्तव की कहानी पर निर्देशन संदीप कुमार ने किया। नाटक में नागेश पटवा, उत्कर्षित कुशवाहा, शिवम केसरवानी, अनिल पटवा, कंचन श्रीवास्तव, राजेश कुमार आदि ने अभिनय किया।
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