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रामकथा के वैविध्य को बयां कर रहे फारसी उर्दू के दुर्लभ ग्रंथ

Sun, 01 Nov 2015 01:55 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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 इलाहाबाद (ब्यूरो)। रामकथा अभी तक आपने संस्कृत और अवधी भाषा में ही अकसर पढ़ी और देखी होगी, लेकिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निराला सभागार में इसे उर्दू और फारसी भाषा में भी पढ़ा, देखा जा सकता है। सभागार में सन 1648 में साअद उल्लाह मसीह पानीपती की फारसी भाषा में लिखी रामायण मसीही और उर्दू में मुंशी जगन्नाथ खुश्तर द्वारा 1855 में लिखी गई रामायण खुश्तर की प्रदर्शनी क्षेत्रीय अभिलेखागार की ओर से लगाई गई है।
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प्रदर्शनी में 1648 से लेकर 1904 के मध्य उर्दू-फारसी भाषा में रामकथा पर लिखे गए दुर्लभ ग्रंथों के विभिन्न प्रसंगों के चित्रों को भी प्रदर्शित किया है। उद्घाटन मंडलायुक्त राजन शुक्ला ने किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास से युवा पीढ़ी में भाषायी सद्भाव की समझ विकसित होगी। बतौर मुख्य वक्ता इविवि के उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर अली अहमद फातमी ने कहा कि धर्म ग्रंथों का विविध भाषाओं में अनुवाद अरसे से होता रहा है, लेकिन लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है। इस तरह के कार्यक्रमों से हमें अपनी रवायतों के बारे में पता चलेगा। हमीदिया गर्ल्स कालेज की प्राचार्य डॉ. रेहाना तारिक ने क्षेत्रीय अभिलेखागार के प्रयासों की सराहना की।

 कार्यक्रम की अध्यक्षता आर्यकन्या डिग्री कालेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. कोमल भटनागर ने की। संचालन हमीदिया गर्ल्स डिग्री कालेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नासिरा ने किया। संयोजक क्षेत्रीय अभिलेख अधिकारी अमित अग्निहोत्री प्रदर्शनी के औचित्य पर प्रकाश डाला। प्रदर्शनी तीन नवंबर तक लगी रहेगी।
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