इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण के दावे पर मजिस्ट्रेट द्वारा पत्नी को अंतरिम राहत देने के आदेश पर हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है और कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में मजिस्ट्रेट को अपना भरण-पोषण करने में अक्षम माता-पिता, पत्नी व बच्चों को प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश देने का अधिकार है। यह आदेश अर्जी पर नोटिस के 60 दिन के भीतर दिया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि यह उपबंध 24 सितंबर 2001 से इस लिए लागू किया गया है ताकि भरण-पोषण पाने के लिए कोर्ट के फैसले का लंबे समय तक इंतजार न करना पड़े। अपना भरण-पोषण कर पाने में असमर्थ पत्नी या माता-पिता आदि आश्रितों को तत्काल राहत दी जा सके। ताकि उन्हें आर्थिक कठिनाइयों से न गुजरना पड़े। कोर्ट ने अंतरिम भरण-पोषण के आदेश की वैधता के खिलाफ याचिका की पोषणीयता पर आपत्ति पर विचार करते हुए दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति डा वाईके श्रीवास्तव ने मिथिलेश मौर्या की याचिका पर दिया है। याची की पत्नी द्रुमलता मौर्या ने भरण-पोषण का दावा आजमगढ़ में दाखिल किया। परिवार न्यायालय ने अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया। जिसे यह कहते हुए चुनौती दी गई कि अंतरिम भरण-पोषण आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को वैध करार देते हुए याचिका खारिज कर दी है।