इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक विवेक के बिना पारित ट्रायल कोर्ट का आदेश जीवन व स्वतंत्रता के लिए खतरनाक है। ऐसे आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सिद्धार्थ व न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की खंडपीठ ने अलीगढ़ निवासी संतोष की याचिका स्वीकार कर ली और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को यह विवेकाधिकार था कि सभी सजाओं को साथ-साथ चलाने का निर्देश दे। ऐसा न करना याची के साथ अन्याय है। खासकर तब जब याची ने अपराध स्वीकार किया हो और सभी मामलों में एक ही दिन, एक ही अदालत ने फैसला सुनाया हो। व्यक्तिगत स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। इसका संरक्षण जरूरी है। सभी छह मामलों में याची को दी गई डेढ़ साल कारावास की सजा एक साथ चलेगी।
मामला जवां थाना क्षेत्र का है। याची के खिलाफ 2023 में बिजली उपकरणों की चोरी की छह अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। 2025 में याची ने सभी आरोपों को स्वीकार कर जुर्माना भर दिया। ट्रायल कोर्ट ने स्वीकारोक्ति के आधार पर छह जनवरी 2024 को उसे सभी मामलों में दोषी करार दिया। साथ ही हर मामले में डेढ़ साल की सजा सुनाई थी, जो क्रमवार (लगातार) चलने वाली थी। इससे उसे कुल नौ साल जेल में रहना पड़ता। लगातार चलने वाली सजाओं के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि प्ली बार्गेनिंग (समझौता) के आधार पर यह मानते हुए अपराध स्वीकार किया कि सभी मामलों में उसे डेढ़ साल की कैद के बाद रिहाई मिल जाएगी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 427(1) के तहत प्रदत्त विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं किया है। अगर न्यायिक विवेक का प्रयोग किया गया होता तो सभी छह मामलों में एक साथ दोषी ठहराते समय सजा को क्रमवार या साथ-साथ चलाने का स्पष्ट आदेश देना चाहिए था। ऐसा नहीं करने से डेढ़ साल की सजा याची को नौ साल भुगतनी होगी, जो स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है।