इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-156(3) के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत का पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और जांच का दिया गया आदेश अंतरिम प्रकृति का होता है। यह आदेश केवल आपराधिक मामलों की जांच प्रारंभ कराने के लिए होता है न कि अभियुक्त के अधिकारों का अंतिम निर्धारण करने के लिए। इसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका पोषणीय नहीं है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की अदालत ने हाथरस निवासी नाहनी व अन्य की ओर से दाखिल पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। याचियों ने हाथरस के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत के तीन नवंबर-2023 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पुलिस को उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच के निर्देश दिए गए थे। इसके खिलाफ याचियों ने पुनरीक्षण याचिका दाखिल कर हाईकोर्ट से इस आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। फादर थॉमस मामले में पूर्ण पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ न तो संज्ञान लिया गया है और न ही कोई प्रक्रिया जारी हुई है। वे धारा-156(3) के आदेश को चुनौती देते हुए आपराधिक पुनरीक्षण दाखिल नहीं कर सकते। यह आदेश अंतरिम होता है। इसके खिलाफ सीआरपीसी की धारा-397(2) के तहत पुनरीक्षण याचिका पोषणीय नहीं है।
क्या है सीआरपीसी की धारा-156 (3)
संज्ञेय अपराध के पुराने मामले में जब पीड़ित की तहरीर पर पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती, तब सीआरपीसी की धारा-156(3) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में अर्जी दाखिल की जा सकती है। इस पर मजिस्ट्रेट की अदालत संबंधित थाने को एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच का आदेश दे सकती है।