इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया कि सहायता प्राप्त (एडेड) शिक्षण संस्थानों के शिक्षक जो 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुए हैं, वे भुगतान ग्रेच्युटी अधिनियम-1972 के तहत ग्रेच्युटी के हकदार हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक फैसले में स्पष्ट किया कि सहायता प्राप्त (एडेड) शिक्षण संस्थानों के शिक्षक जो 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुए हैं, वे भुगतान ग्रेच्युटी अधिनियम-1972 के तहत ग्रेच्युटी के हकदार हैं। कोर्ट ने देरी के आधार पर याचिका खारिज करने से इन्कार कर दिया।
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कहा कि ग्रेच्युटी कर्मचारी का कानूनी अधिकार है। इसे केवल देरी के आधार पर नहीं रोका जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने मेहर जहां की याचिका पर दिया। रामपुर निवासी याची 60 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हुईं। पेंशन मिल रही है पर उन्हें ग्रेच्युटी नहीं दी गई। इसे लेकर उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि ग्रेच्युटी एक्ट-1972 के अनुसार याची ग्रेच्युटी पाने की हकदार है। राज्य सरकार वकील ने दलील दी कि शिक्षक ने 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होने का विकल्प नहीं चुना था। इसलिए शासनादेश के अनुसार वह ग्रेच्युटी की पात्र नहीं हैं। उन पर 1964 के नियम लागू होते हैं जो केवल सेवाकाल में मृत्यु होने पर ही ग्रेच्युटी प्रदान करते हैं।
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कोर्ट ने कहा कि एडेड स्कूलों के शिक्षकों के पद राज्य सरकार के अधीन पदों के समान होते हैं। 1964 के नियम उन शिक्षकों पर लागू नहीं माने जा सकते जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम-1972 की धारा 2(ई) के तहत दी गई कर्मचारी की परिभाषा से याचिकाकर्ता को बाहर नहीं रखा जा सकता। क्योंकि, उनके मामले में ग्रेच्युटी प्रदान करने वाले कोई वैकल्पिक वैधानिक नियम मौजूद नहीं थे। अंततः कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की ग्रेच्युटी की गणना 1972 के अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार आठ सप्ताह के भीतर कर भुगतान सुनिश्चित किया जाए।