डॉ.अमित दुबे के मुताबिक एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (ईजीएफआर) एक ट्रांसमेम्ब्रेन प्रोटीन है। इससे ब्रेन कैंसर होता है। लेकिन, इसके विकास या प्रोटीन को रोककर कैंसर रोगी के ट्यूमर को बढ़ने से रोका जा सकता है।
पूरी दुनिया के लिए चुनौती बने कैंसर के इलाज के लिए एक सुखद खबर है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विजिटिंग शोधकर्ता डॉ. अमित दुबे और शोध छात्रा आयशा तुफैल ने शोध के जरिए दावा किया है कि कलौंजी बीज में छिपे प्राकृतिक यौगिक ब्रेन कैंसर और फेपड़े के कैंसर से लड़ने में काफी प्रभावी हैं। इसमें छिपे तत्व कैंसर को बढ़ने से रोकने में काफी हद तक सक्षम हैं। बीते दिनों रूस के नोवोसिबिसर्क में हुए अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस में ब्रेन और लंग्स कैंसर पर किए शोध के आधार पर उन्होंने यह दावा प्रस्तुत किया। इसके लिए रूस की शोध टीम की ओर से उन्हें सर्टिफिकेट देकर सम्मानित भी किया गया।
विज्ञापन
डॉ.अमित दुबे के मुताबिक एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (ईजीएफआर) एक ट्रांसमेम्ब्रेन प्रोटीन है। इससे ब्रेन कैंसर होता है। लेकिन, इसके विकास या प्रोटीन को रोककर कैंसर रोगी के ट्यूमर को बढ़ने से रोका जा सकता है। शोधकर्ताओं ने दावा किया कि कलौंजी के बीज और पौधे के कुछ प्राकृतिक यौगिक जैसे अल्फा-हेरेडरिन, निगेलिडाइन, थाइमॉल, थायमोक्विनोन और थायमोहाइड्रोक्विनोन ब्रेन कैंसर के कारक ईजीएफआर के प्रोटीन को बहुत अच्छे से बाधित करते हैं। इतना ही नहीं यह बालों के झड़ने, शारीरिक कमजोरी, रोग प्रतिरोधक कम होने आदि दुष्प्रभावों से बचाते हैं। कोई भी कलौंजी के बीज को अपने खान-पान में इस्तेमाल करके इनका लाभ ले सकता है।
कलौंजी बीज के उपयोग
कलौंजी का बीज एक काला, बूंद के आकार का बीज है। इसका उपयोग करी, सूप और स्टॉज में भी किया जाता है। इसके बीज को निगेला सैटिवा ( काला जीरा) के नाम से भी जाना जाता है।