इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ही मुद्दे पर बार-बार जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल करने को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया है। साथ ही मऊ निवासी की याचिका खारिज कर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ही मुद्दे पर बार-बार जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल करने को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया है। साथ ही मऊ निवासी की याचिका खारिज कर 10 हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने दिया है। हर्जाने की राशि चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट की विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा करनी होगी। मऊ निवासी अनिल चौहान ने जनहित याचिका दाखिल कर ग्राम सभा मिश्रौली से बैरासी और मिश्रौली के नाम से नई गठित करने की मांग की थी।
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कोर्ट ने पाया कि इसी विषय पर याचिकाकर्ता की पिछली जनहित याचिका का निस्तारण हो चुका था। पूर्व में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ग्राम सभा के गठन या पुनर्गठन का अधिकार राज्य सरकार का है। किसी क्षेत्र की आबादी के आधार पर अलग ग्राम सभा बनाने के लिए व्यक्तिगत याचिकाएं स्वीकार नहीं की जा सकतीं।
इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने नया प्रत्यावेदन देने का हवाला देकर नई याचिका दाखिल की। हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह निराधार बताया। कहा, केवल नया प्रत्यावेदन देने से उसी विषय पर नई जनहित याचिका दायर करने का अधिकार नहीं मिलता। याचिकाकर्ता ने पूर्व में पारित आदेश का उल्लेख भी नहीं किया था। बिना किसी नए तथ्य या परिस्थितियों के बार-बार जनहित याचिका दाखिल करना गलत है।