इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र के आवेदन को बिना ठोस कारण बताए खारिज करना असांविधानिक है। केवल विभागीय वेबसाइट पर साक्ष्य अभाव लिखकर आवेदन निरस्त करना पर्याप्त नहीं है। प्रशासनिक अधिकारियों को कारणयुक्त आदेश पारित कर उसकी प्रति आवेदक को उपलब्ध करानी होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार और सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने मथुरा निवासी आलोक ढांगर और उनकी बहन की याचिका पर दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अनुसूचित जाति ढांगर श्रेणी में प्रमाण पत्र के लिए तहसीलदार के समक्ष आवेदन किया था। 23 फरवरी 2026 को उनका आवेदन केवल साक्ष्य अभाव अंकित कर खारिज कर दिया गया। उन्हें अस्वीकृति का विस्तृत कारण, जांच रिपोर्ट की प्रति या आदेश की प्रति नहीं भेजी गई। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। खंडपीठ ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि केवल वेबसाइट पर सूचना अपलोड करना विधिसम्मत सूचना नहीं है। प्रत्येक आवेदक का यह वैधानिक अधिकार है कि उसे अस्वीकृति के आधार बताए जाएं।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया कि आवेदकों को जांच रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज करने और कमियां दूर करने का अवसर मिलना चाहिए। इसके बाद स्वीकृति या अस्वीकृति का विस्तृत एवं कारणयुक्त आदेश पारित किया जाए। इस आदेश की प्रति सात दिनों के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराई जाए। अदालत ने यह भी कहा कि विभागीय वेबसाइट पर जांच रिपोर्ट और अंतिम आदेश डाउनलोड करने योग्य लिंक के रूप में उपलब्ध हों।
प्रक्रिया में पारदर्शिता
न्यायालय ने निर्देश दिया कि जाति प्रमाण पत्र आवेदन की पूरी प्रक्रिया आवेदन की तारीख से दो महीने के भीतर पूरी की जाए। प्रदेश के मुख्य सचिव को भी इस आदेश को सभी जिलों और तहसील स्तर तक प्रेषित करने का निर्देश दिया गया। साथ ही तीन महीने के भीतर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने पर विचार करने को कहा गया।