हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि 1984 के सिख दंगों के मामले में 2008 में जारी शासनादेश पर राज्य सरकार पुनर्विचार करे। कोर्ट का मानना है कि पीड़ितों को मुआवजा देने के संबंध में केेंद्र सरकार द्वारा 16 जनवरी 2006 को जारी आदेश की राज्य के शासनादेश में गलत तरीके से व्याख्या की गई है। घायलों को हुई क्षति का आंकलन मनमाने तरीके से करके मुआवजा दिया गया। कई मामलों में पुलिस ने प्राथमिकी जांच कर माना कि पीड़ित को क्षति हुई है, मगर उसे मुआवजा नहीं दिया गया। जो लोग शहर छोड़कर चले गए थे, उनको भी मुआवजा नहीं दिया गया।
कोर्ट ने गृह सचिव को निर्देश दिया है कि पीड़ितों की अर्जियों का निस्तारण कर 18 जनवरी 2018 को अपनी रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत करें। गुरु सिंह सभा कानपुर नगर की जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति राजीव जोशी की पीठ सुनवाई कर रही है। याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता आरएस सोढ़ी ने बहस की। उनका कहना था कि केंद्र सरकार ने मुआवजे के लिए 18 करोड़ 36 लाख रुपये दिए थे, मगर राज्य सरकार ने इसमें से सिर्फ छह करोड़ 50 लाख रुपये का मुआवजा ही बांटा। कानपुर नगर में हुए दंगे में 204 लोगों की मौत हुई थी और डर के मारे करीब पांच हजार लोग शहर छोड़कर विस्थापित हो गए। जिन लोगों की पूरी दुकान जला दी गई थी, उनको सिर्फ पांच हजार रुपये मुआवजा दिया गया।
केंद्र सरकार ने दस गुना अधिक मुआवजा देने का निर्देश दिया था, मगर उसकी मनमाने तरीके से व्याख्या कर तमाम लोगों को मुआवजा दिया ही नहीं गया। सरकार ने पीड़ितों को चार श्रेणियों में बांटकर मामूली मुआवजा दिया। अधिकारियों ने नानावती आयोग की सिफारिशें भी दर किनार कर दीं। प्रदेश सरकार का कहना है कि मुआवजे के संबंध में पुनर्विचार करने के लिए तैयार है।