इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस किसी केस की विवेचना पूरी कर मजिस्ट्रेट के समक्ष चार्जशीट दाखिल कर देने के बाद , मजिस्ट्रेट की अनुमति बगैर दोबारा उसी केस की विवेचना नहीं कर सकती है। ऐसा करना गैर कानूनी है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस का यह कार्य कानून में प्राप्त शक्ति का दुरुपयोग है। यह निर्णय जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत दाखिल अर्जी को स्वीकार करते हुए दिया है। कोर्ट ने पुलिस द्वारा दोबारा जांच कर दाखिल चार्जशीट तथा इसके आधार पर मजिस्ट्रेट द्वारा जारी तलबी आदेश को भी रद्द कर दिया है।
मामले के अनुसार विपक्षी उमाशंकर कुशवाहा ने एक मुकदमा याची दरोगा व कई अन्य के खिलाफ थाना- बनकटा, जिला देवरिया में इस बात का दर्ज कराया कि उसका सहन कब्जा करने के लिए विपक्षी आए और उसकी पत्नी व दो बेटियों को भाला, लाठी, डंडा, फरसा से घायल कर दिया। छप्पर में आग लगा दी और जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने जांच कर प्रत्यक्षदर्शियों के बयान को आधार बना कर चार्जशीट मजिस्ट्रेट के समक्ष दाखिल कर दिया। याची आरोपियों ने तलब होने के बाद हाजिर होकर जमानत भी करा ली। इतनी कार्रवाई हो जाने के बाद विपक्षी ने एक अर्जी एस पी देवरिया को दी कि इस केस की विवेचना थाना बनकटा से हटाकर पुन: जांच के लिए दूसरे थाना सलेमपुर को भेजा जाय। एसपी ने उस अर्जी पर वैसा ही आदेश कर दिया। पुलिस ने दुबारा जांच की और चार्जशीट दाखिल कर दी। मजिस्ट्रेट ने नया केस रजिस्टर कर याचीगण को तलब कर लिया, जबकि याचीगण प्रथम चार्जशीट के आधार पर जमानत करा ट्रायल फेस कर रहे थे। हाईकोर्ट ने कहा कि पहले ही चार्जशीट दाखिल हो चुकी थीं और उसके आधार पर केस का ट्रायल भी शुरू हो गया है। ऐसे में बिना ज्युडीशियल मजिस्ट्रेट की अनुमति बगैर दोबारा पुलिस को जांच का आदेश देना शक्ति का दुरुपयोग है। यद्यपि कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के अंतर्गत पुलिस को दुबारा जांच का अधिकार है, परंतु यह अधिकार कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बगैर नहीं किया जा सकता है ।