ramadan gives a chance to become a better person
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मुकद्दस रमजान में तीस रोजे रखने वालों को बेहतर इंसान बनने का मौका मिलता है। ईमानवालों पर रमजान के रोजे इसलिए फर्ज किए गए हैं ताकि रोजेदार चरित्रवान बनें। विचार पवित्र हों, अच्छी बातें सुनें, भूखों की भूख मिटाने का जज्बा पैदा हो। तमाम नेकियों और खूबियों की नसीहत पर अमल करने के साथ ही अबकी रोजेदार कोरोना सहित तमाम तरह की बलाओं से निजात दिलाने के लिए खुदा की बारगाह में सजदे में हैं। रोजा, इबादत और तिलावते कुरानपाक में ही दिन-रात बीत रहा है।
तमाम हिदायतों पर अमल करते हुए एक बेहतर इंसान बनने के लिए रमजान से बेहतर और दूसरा कोई मौका नहीं। इस एक महीने के दौरान अगर हम एक सच्चा रोजेदार बनकर रहें तो इस दौरान के सबक और नसीहतें हमें साल के ग्यारह महीनों के लिए भी सही राह दिखाएंगी।
असर फाउंडेशन के संयोजक शौकत भारती कहते हैं, अगर कुरान मजीद में बताई गई हिदायतों को ठहर-ठहर कर पढ़ा जाए और उस पर रमजान के तीस दिनों में बाकायदा अमल करते हुए अपने ऊपर फर्ज कर लिया जाए तो निश्चित ही हर रोजेदार नेक दिल इंसान बन जाएगा। साथ ही वह समाज की तमाम बुराइयों से दूर रहकर दूसरों को भी नेकी की राह दिखा सकता है। रमजान की इबादत में चरित्रवान बनने और भूखों की भूख मिटाने से बेहतर और क्या हो सकता है। हर कोई जानता है कि भूख और प्यास में क्या तकलीफ होती है। इसका एहसास रोजे में हर रोजेदार को करना जरूरी है। लेकिन, सिर्फ एहसास ही करना काफी नहीं बल्कि इस एहसास के बाद भूखों की भूख मिटाने की कोशिश भी जरूरी है तभी हम एक नेक इंसान बन सकेंगे। रोजे हमें यही नसीहत देते हैं।
शहर काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी कहते हैं कि खुदा की रहमत उसे ही मिलती है, जो दूसरों को रहमत पहुंचाता है। जो कोई भी रोजेदार पैगंबर के बताए रास्ते पर चलेगा, उसी का रोजा कुबूल होगा और वही रोजेदार रहमत का फायदा हासिल कर सकेगा। जिसने रोजा रखकर भी दूसरों की भूख-प्यास का ख्याल नहीं रखा, जिसने रोजा रखकर भूख-प्यास का एहसास करते हुए दूसरों की भूख मिटाने का इंतजाम नहीं किया, उसे खुदा की रहमत नहीं मिलेगी। इस दौरान रोजेदार अपने गुनाहों से माफी भी पा सकता है। लॉकडाउन में घरों में ही रहकर ज्यादा से ज्यादा इबादत में मशगूल हों। इंसान ज्यादा से ज्यादा इबादत करके अपने गुनाहों से मगफिरत हासिल कर सकता है।