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UP: कस्टम अधिकारी की नौकरी छोड़ राधेय से बनीं कृष्णा माता, अन्न का किया त्याग, संगम की रेती पर कर रहीं कल्पवास

Tue, 20 Jan 2026 02:51 PM IST
विनोद सिंह विनोद बघेल, प्रयागराज

सार

Prayagraj Magh Mela : जहां एक ओर दुनिया सफलता को पद, पैसा और प्रतिष्ठा की कसौटी पर तौलती है, वहीं तमिलनाडु की धरती से उठी एक साध्वी ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची सिद्धि आत्मबोध में है। यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा पास कर कस्टम विभाग की अधिकारी बनीं राधेय ने जब संसार की माया का त्याग कर कृष्णा माता बन गईं। वह वैराग्य, तप और त्याग की जीवंत प्रतिमूर्ति हैं।  अन्न तक का परित्याग कर ब्रह्मपथ की साधना में लीन कृष्णा माता कैवल्य महिला अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर हैं। 
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कृष्णा माता, वृंदावन। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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यूपीएससी की कड़ी परीक्षा पास करके कस्टम अधिकारी बनीं राधेय ने 17 साल नौकरी करने के बाद त्याग पत्र दे दिया और संन्यास ग्रहण कर लिया। इस समय वह प्रयागराज में कल्पवास कर रही हैं। सांसारिक मोह माया का त्याग कर संन्यास ग्रहण करने के पीछे वह अपनी स्वतंत्रता बताती हैं। अपने पूर्व जीवन के बारे में बात करने से वह काफी कतराती हैं। कहती हैं कि जैसे इस संसार में किसी को नहीं पता कि वह पिछले जन्म में क्या था और कौन था। उसी तरह मैं भी पिछले जन्म (गृहस्थ जीवन) को भूलना चाहती हैं। मुझे नहीं पता कि पहले मैं क्या थी और किस पद प्रतिष्ठा पर आसीन थी। वह सब कुछ भूलकर सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहना चाहती हैं। 13 वर्षों से उन्होंने अन्न का त्याग कर दिया है और एक टाइम सिर्फ फलहार ग्रहण करती हैं। कृष्णा माता का शिविर माघ मेला में अरैल क्षेत्र में यमुना के तट पर है। 

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तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली की रहने वाली कृष्णा माता का नाम राधेय था। अयंगर ब्राह्मण परिवार से ताल्लुकात रखने वाली कृष्णा माता 1994 में तीसरे प्रयास में  यूपीएससी की परीक्षा पास किया। इसके बाद कस्टम विभाग में क्लास वन के विभिन्न पदों पर रहीं। 17 साल सेवा देने के बाद उन्होंने 2015 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले  लिया। जब उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दिया  उस समय वह चेन्नई में तैनात थीं। इसके पहले वह कई जिलों में ग्रेड वन अफसर के तौर पर सेवाएं दे चुकी थीं। 


सांसारिक मोह माया का त्याग करने के बाद वह मथुरा के वृंदावन स्थित तपोवन पहुंच गईं। यहां पर पश्चिम बंगाल के रहने वाले कमल मधुसूदन जी महाराज से दीक्षा लेकर श्रीकृष्ण की भक्ति में रम गई। कमल मधूसूदन जी महाराज की पुष्प समाधि राधा दामोदर मंदिर वृंदावन में है। कृष्णा माता ने कहा कि गीता और सनातन  धर्म के अनुसार मनुष्य का 100 वर्ष की आयु निर्धारित कर आश्रम का निर्धारण किया गया है। बचपन से 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य, 25 से 50 वर्ष तक गृहस्थ, 50 से 75 वर्ष तक संन्यास की व्यवस्था की गई है। मैने भी 50  वर्ष की आयु पूरी करने के बाद संन्यास आश्रम में प्रवेश किया। गृहस्थ जीवन में रहने के दौरान एक बार वह इस आश्रम में आई थीं और अपने गुरु और साधु संतों के विचार से काफी प्रभावित हुई थीं। इसके बाद जब  उन्होने मोह माया का त्याग किया तो सीधे वृंदावन के तपोवन पहुंचीं।

कैवल्य अखाड़ा महिला का किया गठन

महिला साध्वियों को उनका आधिकार दिलाने के लिए कृष्णा माता ने  कैवल्य महिला अखाड़े का गठन किया है और उसकी आचार्य  महामंडलेश्वर हैं। अखाड़े में दर्जन भर से अधिक संन्यासी साध्वी के साथ ही बड़ी संख्या में गृहस्थ महिला संत जुड़ी हैं।  

संसार तो सागर है, डूबने की इच्छा नहीं

कृष्णा माता ने कहा कि सांसारिक जीवन में उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी। सब  कुछ ठीक  चल रहा था, लेकिन स्वतंत्र रहने की इच्छा जागृत हुई और उन्होंने एक झटके  में  सब कुछ त्याग करके संन्यास ले लिया। परिवार के बारे में पूछने पर वह कहती हैं कि परिवार के लोग उनके आश्रम आए थे। एक दो बार आए। कुछ देर रोते रहे। इसके बाद  चले गए। कहा कि पद, प्रतिष्ठा, वैभव और धन दौलत कुछ भी साथ नहीं जाएगा। जीवन का उद्देश्य केवल पद, पैसा और प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और लोककल्याण भी है। जब मनुष्य अपने भीतर के कृष्ण को पहचान लेता है, तब उसे बाहरी संसार की चमक आकर्षित नहीं करती।

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एक ही गांव की हैं कृष्णा माता और हेमा मालिनी 

कैवल्य अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर कृष्णा माता का कहना है कि फिल्म अभिनेत्री हेमा मालिनी उनके गांव श्रीरंगापुरम की ही हैं। बचपन में गांव में उनसे मुलाकात अक्सर हो जाती थी। बाद में हेमा मुंबई चली गईं। हेमा मालिनी अभी मथुरा से सांसद हैं। वह जब भी मथुरा के दौरे पर आती हैं तो मिलने के लिए उनके आश्रम में आती हैं। उन्होंने सांसद के रूप में हेमा मालिनी के कार्यों की सराहना की।

महिला अखाड़े का अलग से हो शाही स्नान

कृष्णा माता का कहना है कि अन्य अखाड़ों की तरह महिला अखाड़े का भी अलग से शाही स्नान होना चाहिए। इसके लिए वह आवाज उठाएंगे। आने वाले कुंभ में महिला अखाड़े को अलग से शाही स्नान करने की व्यवस्था के लिए महिला अखाड़ों और महिला साधु संतों के साथ बातचीत  कर रही हैं। 
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