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मोबाइल को लगाएं ताला, बच्चे हो रहे ‘बीमार’ 

Sat, 27 Apr 2019 01:08 AM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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child - फोटो : प्रयागराज
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मोबाइल की लत बच्चों को मनोरोगी बना रही है। कई घंटे मोबाइल पर व्हाट्सएप और गेम खेलने से बच्चों के हिस्टीरिया जैसे रोग से पीड़ित होने का भी खतरा है। डॉक्टर कहते हैं कि हर समय मोबाइल रखने वाले किशोर-किशोरियों की मानसिक के साथ शारीरिक सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
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इतना ही नहीं मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से घरेलू महिलाएं और युवा पीढ़ी के व्यवहार में परिवर्तन के मामले भी सामने आए हैं। शहर ही नहीं गांवों में भी लोग मोबाइल फोबिया के शिकार हो रहे हैं। इस लत से बच्चेे पढ़ाई में पिछड़ रहे हैं और बड़े एकाकीपन की तरफ बढ़ते हुए चिड़चिड़े हो रहे हैं। जिला अस्पताल कॉल्विन के किशोर-किशोरी स्वास्थ्य परामर्श केंद्र में हर दिन व्हाट्सएप, फेसबुक, पब्जी गेम, सर्फिंग की लत के करीब 250 बच्चे इलाज कराने पहुंच रहे हैं। इससे इतर युवा, महिलाएं और अन्य उम्र के लोगों की संख्या अलग है। एक वर्ष में 3032 मामलों की काउंसलिंग में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

कॉल्विन अस्पताल के परामर्श केंद्र में आए 80 फीसदी मामलों में अधिकतर किशोर ‘इंटरनेट एडिक्ट’ पाए गए हैं। सोशल मीडिया के लती इन बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन देख उनके अभिभावक उन्हें साथ लेकर मनोचिकित्सकों के पास पहुंचे। कुछ ऐसे भी केस सामने आए, जिसमें अभिभावकों के टोकने पर बच्चे उग्र हो गए। मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान के मुताबिक उनकी ओपीडी में कौड़िहार से आई एक 13 वर्ष की बच्ची के माता-पिता ने बताया कि उसे मोबाइल फोन न मिले तो वह दीवार पर सिर टकराने लगती है। फिर भी मोबाइल न मिला तो तेज गुस्सा करते हुए हिंसक हो जाती है। उसने क्रोध में घर में लगी टीवी सहित कई अन्य सामान तोड़ दिए।
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इसी तरह अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाली एक 15 वर्षीय छात्रा की छमाही परीक्षा का रिजल्ट आया तो घरवाले चौंक गए। कक्षा में प्रथम पांच बच्चों में रहने वाली उनकी बेटी फिसड्डी ही नहीं, तीन विषयों में लाल निशान पा गई। घर वालों ने छानबीन की तो पता चला कि व्हाट्सएप और गेम के चक्कर में उसका मन भटक गया। वह घर पर रहती तो सिर में दर्द की शिकायत करती थी। एक अन्य मामले में 16 वर्षीय एक किशोर ने पब्जी गेम खेलने से मना करने पर जान देने की कोशिश की। अभिभावक फिर भी नहीं माने फांसी लगाकर जान देने की कोशिश की। परिवारीजन उसे परामर्श केंद्र तक लाए। उसकी काउंसलिंग कर दवाएं दी गईं। अब वह सामान्य है। कुछ मामलों में नाबालिग नशे के आदी पाए गए तो एक किशोर अश्लील वीडियो देखकर एक लड़की से दुर्व्यवहार कर गया। 

ऐसे मामलों में परामर्श कें द्र आने वाले बच्चों में पढ़ाई में मन न लगना और भूख न लगने की परेशानी लगभग सभी मरीजों में एक जैसी रही। काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि किशोरावस्था में कदम रखते ही मानसिक और शारीरिक बदलाव के साथ उन्हें इंटरनेटयुक्त मोबाइल दे दिया गया। घरवालों से बचकर फिल्में देखने, गेम खेलने, दोस्तों से चैट करने के साथ व्हाट्सएप पर घंटों जुटे रहने के लिए उन्हें लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की जरूरत नहीं रही। वह इसके लती हो गए और अभिभावकों से बातचीत करने में संकोच करने लगे। रोकने-टोकने पर गलत रास्तों पर चले या साथियों के उकसाने पर घर वालों को नए तरीके से धोखा देने लगे। यह स्थिति गलत धारणाएं बनाने के लिए मुफीद हो गई। इससे वह मानसिक रूप से बीमार होने लगे। इसका प्रभाव उनके  शरीर पर भी पड़ा। कई अभिभावकों ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चों को रजाई और कंबल के भीतर मोबाइल चलाते देखा और मना किया। 

चौंकाने वाला सच

0 व्हाट्सएप, मोबाइल पर गेम खेलने वाले 80 फीसदी किशोर-किशोरियां अवसाद, तनाव में 
0 अधिकांश मामलों में मोबाइल चलाने में ज्यादा समय उन्हें हिस्टीरिया जैसी बीमारी दे रहा है
0 बड़ी उम्र वालों के प्रति बढ़ा आकर्षण, खेल और सामाजिक कार्यों से उनकी दूरी बढ़ रही है 

परिजन ऐसे कर सकते हैं निगरानी
0 बच्चों को दिए गए मोबाइल के क्रोम ब्राउजर की सेटिंग में जाएं। इसमें स्क्रॉल करके नीचे जाएं और साइट सेटिंग ऑप्शन पर टैप करें। यहां अगर कुकीज ऑप्शन ऑफ है तो इसे ऑन कर दें। इसके बाद सर्च हिस्ट्री डिलीट होने के बाद भी आपको साइट्स के बारे में पता चल जाएगा।
0 प्ले स्टोर में कीलॉगर, किड्स पैलेस पैरेंटल कंट्रोल, पैरेंटल कंट्रोल एंड डिवाइस मॉनिटर आदि कई ऐसे एप्स हैं, जिनसे आप किसी की इंटरनेट सर्च पर नजर रख सकते हैं। 
0 व्हाट्सएप पर डिलीट की गई हिस्ट्री रिकॉल कर सकते हैं। इससे आप का बच्चा किस से कब चैटिंग कर रहा है, पता चल जाएगा।

दोस्त की तरह काम करता है स्वास्थ्य परामर्श केंद्र 
इंटरनेट, मोबाइल से उपजी समस्याओं का समाधान करने के लिए किशोर-किशोरी परामर्श केंद्र बच्चों के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करता है। कॉल्विन अस्पताल के एसआईसी डॉ. वीके सिंह के मुताबिक केंद्र में किशोर-किशोरियों के साथ बड़ों को भी संतुलित आहार, एनिमिया मुक्त करने, स्वच्छता, शारीरिक विकास, मासिक धर्म, गर्भ निरोधक, यौन जनित रोग, नशे से बचाव या संबंधित जानकारी दी जाती है। साथ ही किशोरावस्था में शादी की दुश्वारियों के बारे में जागरूक किया जाता है। सभी मरीजों के नाम और पहचान को गुप्त रखा जाता है। यहां मन कक्ष में लड़कियों या महिलाओं को महिला काउंसलर ही परामर्श देती हैं। 

सजग रहें अभिभावक
केंद्र में आने वाले लड़के-लड़कियों की काउंसलिंग में एक बात समान रही कि उनकी अभिभावकों से दूरी बनी रही। अधिकांश बच्चे अपनी लोकेशन देने के लिए फोन पा गए, लेकिन संगत में उन्हें इसके दुरुपयोग की लत लग गई। अधिकांश मामलों में बिना दवाओं के उपचार हो जाता है। जरूरत सिर्फ अभिभावकों को सजग रहने की है। वह बच्चों से मित्रवत व्यवहार करें और उनकी गतिविधियों पर नजर रखें। जरूरी यह भी है उनके दोस्त कैसे हैं, वह उनके साथ कितना समय कहां व्यतीत करते हैं। समस्या का समाधान हो जाएगा।
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डॉ. राकेश पासवान
मनोचिकित्सक, परामर्शदाता
मोती लाल नेहरू चिकित्सालय( कॉल्विन)
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