अंजुमने रूहे अदब की स्थापना की हीरक जयंती वर्ष पर आयोजित व्याख्यान में रविवार को प्रो. एजाज की रचनाओं पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अधिवक्ता फरमान अहमद नकवी ने उनकी शान में कसीदे पड़े। कहा कि ऐसे अदीब को याद करना सबका व्यावहारिक कर्तव्य है।
अध्यक्षता कर रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय उर्दू विभाग के अध्यक्ष प्रो. अली अहमद फातमी ने एजाज की रचनाओं के साहित्यिक मूल्यांकन पर बल दिया। कहा कि उनकी गजलें और रचनाओं की प्रासंगिता आज भी बनी हुई है। डॉ. हरि नारायण डिग्री कॉलेज के डॉ. फाजिल हाशमी ने कहा कि प्रो. एजाज हुसैन का व्यक्तित्व चुंबकीय था। उनको अपने शिष्यों पर नाज था। डॉ. फाजिल ने उनसे जुड़ी यादों को सांझा किया। बताया कि शायरी के साथ उन्होंने 12 किताबें लिखीं। वह किताब साज के साथ किरदार साज भी थे। उन्होंने पहली बार उर्दू मेें डी.लिट की उपाधि प्राप्त की थी। कार्यक्रम में डॉ. असफाक हुसैन, कर्नल अबरार अहमद ने भी अपनी बात रखी। संचालन तूफान दरियाबादी ने किया। कार्यक्रम में नियाज फारूकी, महफूज अहमद, खुर्शीद नकवी, हैदर जैदी, अरशद जमील, निसार अहमद, शाहिद रिजवी, इफ्तेखार अहमद, परवेज खान आदि मौजूद रहे।
डॉ. राम कुमार वर्मा ट्रस्ट की ओर से ‘मध्ययुग में संस्कृत तथा फारसी भाषा की साहित्यिक प्रवृत्तियां’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एनआर फारूकी ने कहा कि मध्य काल में लाहौर केंद्र बन गया था। डॉ. राम कुमार वर्मा के साकेत प्रयाग स्ट्रीट आवास पर उन्होंने बताया कि उस समय वहां पर फारसी साहित्य बहुत लिखा गया। इसके बाद धीरे-धीरे जन भाषा भी बनी। एक समय ऐसा आया फारसी का भारत में अधिक लेखन होने लगा। इस पर संस्कृत का खूब प्रभाव पड़ा। उस समय फारसी का अनुवाद संस्कृत में और संस्कृत का अनुवाद फारसी भाषा में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व डीन ऑफ आर्ट्स प्रो. मृदुला त्रिपाठी ने धन्यवाद दिया। डॉ. राम कुमार वर्मा की पुत्री प्रो. राजलक्ष्मी वर्मा ने ट्रस्ट के बारे में बताया। संचालन सीएमपी डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आनंद शंकर श्रीवास्तव ने किया।