हत्या के एक मामले में आपराधिक अपील का निस्तारण करते हुए न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की पीठ ने कहा कि स्थापित कानून है कि जब मौखिक साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट असंगत हो तो मौखिक साक्ष्य को वरीयता दी जाएगी। मगर जहां चश्मदीद गवाह के बयान में विरोधाभास हो और मेडिकल साक्ष्य आईविटनेस के साक्ष्य के सही होने की संभावना को पूरी तरह से नकार दे तो मेडिकल साक्ष्य को वरीयता दी जाएगी। अपील पर वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने बहस की।
घटना मुजफ्फनगर के कंधाला थाने की 12 अगस्त 1992 की है। वादी जयवीर सिंह ने रिपोर्ट लिखाई थी कि उसका भाई रमेश घटना वाले दिन सुबह आठ बजे खेत जा रहा था। गांव के जयसिंह के खेत के पास चक रोड पर शेर सिंह, उसके भाई सहेंद्र, गुलाब और साधू ने मिलकर उसकी गोली मार कर हत्या कर दी। वादी मुकदमा ने खुद को घटना का चश्मदीद गवाह बताते हुए कहा कि उसका भाई सुबह आठ बजे घर से नाश्ता करके निकला था और खेत में पिता के लिए खाना लेकर जा रहा था।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपनी दलील में कहा कि मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक उसकी आंत पूरी तरह से खाली थी। इसका अर्थ है कि घटना रात में किसी वक्त या भोर में हुई है।
वादी घटनास्थल पर मौजूद नहीं था और न ही उसने अभियुक्तों को हत्या करते हुए देखा है। कोर्ट ने पाया कि वादी मुकदमा द्वारा दिए गए बयान तथा अन्य साक्ष्यों और मेडिकल रिपोर्ट में काफी विरोधाभास है। वादी द्वारा बताई गई घटना अन्य साक्ष्यों से सही साबित नहीं हो रही है। अधीनस्थ न्यायालय ने चारों अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।