प्रतियोगियों की मांग माने जाने के पीछे उप्र लोक आयोग की ओर से भले ही पीसीएस परीक्षा का विशिष्टता का तर्क दिया गया, लेकिन सच यह है चुनावों के बीच भड़की आंदोलन की आग ने सरकार पर बड़ा दबाव बना दिया। यही वजह थी कि मामले में मुख्यमंत्री तक को पहल करनी पड़ी और इसके बाद आयोग को भी कदम खींचने पर मजबूर होना पड़ा।
उप्र में नौ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के साथ ही इस वक्त कुछ राज्यों के विस चुनाव भी होने जा रहे हैं। इसमें भी विशेष तौर से जब उपचुनाव की सीटों पर जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है, ऐसे समय में युवाओं के आंदोलन से पार्टी को बड़े डेंट का खतरा महसूस होने लगा था।
इसके अलावा विपक्ष भी इस मुद्दे पर सरकार की लगातार घेराबंदी कर रहा था और इसमें न सिर्फ सपा बल्कि कुछ अन्य विपक्षी दल भी शामिल थे। छात्रों की मांगों का समर्थन कर विपक्ष लगातार यह संदेश प्रचारित करने की कोशिश कर रहा था कि सरकार युवा विरोधी और वह उनके हितैषी हैं।
उधर, विपक्ष के अलावा कई सत्तारूढ़ विधायकों के भी अंदरखाने छात्रों के आंदोलन की वकालत करने से सरकार पर दबाव और भी बढ़ गया। इनमें से एक विधायक ने तो खुलकर आयोग की परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन लागू करने का विरोध करते हुए मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा। जबकि शेष भीतरखाने ही कहते रहे कि छात्रों की मांगों को मान लिया जाना चाहिए।
यही वजह थी कि सरकार पर चौतरफा दबाव बढ़ा और फिर इसे देखते हुए मुख्यमंत्री को खुद इस मामले में पहल करनी पड़ी। आयोग अफसरों की ओर से खुद ही यह घोषणा की गई कि मुख्यमंत्री ने इस मामले में आयोग को छात्रों के साथ संवाद व समन्वय बनाकर निर्णय लेेने को कहा। इसके बाद ही आयोग को भी कदम खींचने पर मजबूर होना पड़ा और पीसीएस प्री परीक्षा को पूर्व की तरह सैद्धांतिक रूप से एक दिवस में कराने का निर्णय लेना पड़ा।