कारोबारी, उनकी पत्नी, बेटा और बेटी के सिर पर मिले चोटों के 33 निशान
साउथ मलाका में कारोबारी वीरेंद्र कुमार वैश्य, पत्नी अनीता, बेटी मीनाक्षी और बेटे अभिषेक की हत्या के मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बेरहमी की कहानी दर्ज है। रिपोर्ट के अनुसार, परिवार के चारों सदस्यों पर 33 बार हमला किया गया। सबसे अधिक 12 चोटें बेटे अभिषेक के सिर पर मिली हैं। वीरेंद्र और अनीता के सिर पर 10-10 चोटें हैं। बेटी मीनाक्षी के सिर पर सिर्फ एक चोट, लेकिन निशान बहुत गहरा है। यानी बहुत ते प्रहार किया गया है। सभी में अधिकतर चोटें सिर और शरीर के ऊपरी हिस्से पर हैं। पुलिस का मानना है कि रिपोर्ट से मिले तथ्य केस को मजबूत करने में मदद करेंगे। जांच टीम रिपोर्ट के हर बिंदु का अध्ययन कर रही है। पुलिस टीम आगे की जांच में जुट गई है।
जेल में बंद बेटे की गैरमौजूदगी में हुआ अंतिम संस्कार
हत्याकांड में जान गंवाने वाले कारोबारी वीरेंद्र वैश्य, उनकी पत्नी अनीता, बेटे अभिषेक और बेटी मीनाक्षी के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी रिश्तेदारों ने संभाली। परिवार का छोटा बेटा अश्विनी जेल में बंद है। दूसरे बेटे अभिषेक की हत्या हो चुकी है। बेटे की गैरमौजूदगी में दारागंज घाट पर विद्युत शवदाह गृह में माता-पिता और भाई-बहन का अंतिम संस्कार हुआ।
बुधवार दोपहर पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे रिश्तेदारों ने बताया कि घटना की जानकारी उन्हें मंगलवार देर शाम मिली। इसके बाद वे तत्काल प्रयागराज के लिए रवाना हुए। पोस्टमार्टम हाउस पहुंचने वालों में अनीता वैश्य के कौशाम्बी मंझनपुर निवासी भाई प्रेमचंद्र केसरवानी, महेश केसरवानी, पंकज कुमार उर्फ बबलू, संजय कुमार और वीरेंद्र के भतीजे गौरव, चचेरे भाई अशोक और जानसेनगंज निवासी राजेश और गोपीगंज निवासी प्रवीण कुमार शामिल थे।
रिश्तेदारों ने बताया कि अनीता वैश्य का मायका कौशाम्बी के मंझनपुर में है। हालांकि, पिछले कई साल से वीरेंद्र और उनके परिवार का रिश्तेदारों से बहुत अधिक मेलजोल नहीं था। बुधवार देर शाम पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुलिस ने चारों शव रिश्तेदारों को सौंप दिए। रात करीब 8:30 बजे एंबुलेंस के जरिये शवों को दारागंज घाट ले जाया गया, जहां अंतिम संस्कार किया गया।
हर किसी कि आंखें हो गई थीं नम
श्मशान घाट पर मौजूद रिश्तेदारों की आंखें नम थीं। किसी ने नहीं सोचा था कि एक ही परिवार के चार सदस्यों की अर्थियां एक साथ उठेंगी। परिवार की परिस्थितियां ऐसी हो गई थीं कि अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ी। अंतिम संस्कार कराने के लिए कोई सीधा वारिस मौजूद नहीं था।