इलाहाबाद विश्वविद्यालय की निराला कलावीथिका में चित्रात्मक काव्य प्रदर्शनी ‘क्षिति से क्षितिज तक’ के तहत बुधवार को शब्द और चित्रों की जुगलबंदी में दोनों एक दूसरे के पूरक बने। वरिष्ठ छायाकार संजय बनौधा के छायाचित्रों संग कवयित्री कमल पालीवाल की कविताओं से कैनवास सजा। मन को छू लेने वाली छवियों से शब्दों ने संवाद करते हुए नए अर्थ गढ़े।
बतौर मुख्य अतिथि इलाहाबाद सब एरिया के डिप्टी जीएसओ ब्रिग्रेडियर एके त्रिपाठी ने कहा, छायाचित्रों के साथ कविताएं बहुत कुछ कह देने में समर्थ हैं। विशिष्ट अतिथि इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो राजेन्द्र प्रसाद ने कहा, यह जुगलबंदी हमें सामाजिक सरोकारों से बखूबी जोड़ती है। जानेमाने कलाविद् प्रोफेसर अजय जैतली ने कहा, संजय के छायाचित्र दर्शकों के समक्ष समय के वैविध्य को रखने के साथ उनसे जुड़ने को प्रेरित करते हैं।
गीतकार यश मालवीय ने कहा, शब्द और छायाचित्र मिलकर नई भाषा गढ़ते हैं। प्रो जेएन मिश्र, आरडी बनौधा ने कहा, दो विधाओं को साथ लाने का यह प्रयोग सुखद है। मीडिया विश्लेषक डॉ.धनंजय चोपड़ा ने कहा, प्रदर्शनी समय के सच और सरोकार को बेहतर ढंग से समझने का अवसर देती है।
अंत में छायाकार संजय बनौधा और कवयित्रि कमल पालीवाल ने अपनी सृजनयात्रा के सरोकार साझा किए। अतिथियों ने प्रदर्शनी के उद्घाटन के बाद पुस्तक ‘क्षिति से क्षितिज तक’ का लोकार्पण भी किया। कार्यक्रम में प्रो.रंजना कक्कड़, प्रो.असीम मुखर्जी, अजामिल, डॉ.कुमुदनी पति, डॉ.रेहाना तारिक, एसके यादव आदि मौजूद थे। प्रदर्शनी तीन नवंबर तक दस से चार बजे तक खुली रहेगी।
प्रदर्शनी में शामिल तकरीबन साठ से अधिक छायाचित्रों और कविताओं में संगम का सौंदर्य दिखा, निखरा। अलविदा संगम कहकर परदेसी परिंदों के सुहाने ख्वाब, उनकी उड़ान और चाहत भी बयां हुई। ‘तिमिर का सौंदर्य’ लुभाता रहा तो ‘सूखे दरख्तों का संदेश’ भी पहुंचा। चाक पर अंगुलियों से मिट्टी को अर्थ देते कुम्हार का कौशल दिखा तो प्रकृति की गोद में ‘पीड़ा और सुकून’ का विरोधाभास भी। छायाचित्र शब्दों का संसार रचते हैं तो कविताएं उन्हें देखने की दृष्टि देती हैं।