इसके अलावा इस चुनाव में बसपा बहुत मजबूत नहीं दिखी। 2019 के चुनाव में भी बसपा यहां बहुत मजबूत नहीं थी और दलितों का वोट भाजपा के साथ गया था लेकिन करीब तीन लाख दलित मतदाताओं ने इस बार बूथ पर भी खामोशी दिखाई। बताया जा रहा है कि इस बार दलित मतों के बीच बसपा तथा भाजपा के अलावा सपा ने भी सेंधमारी की है।
फूलपुर सीट पर जातीय समीकरण को देखें तो कुर्मी साढे तीन तथा दलित तीन लाख मतदाता हैं। इनके अलावा ब्राह्मण वोटरों की संख्या ढाई लाख, कायस्थ करीब पौने दो लाख, क्षत्रिय एक लाख वोट हैं। इस तरह से अगड़ी जाति के करीब साढ़े पांच लाख मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ दिखा। वहीं करीब दो लाख 15 हजार मुस्लिम, दो लाख यादव वोटर सपा के साथ पूरी तरह से दिखे।
मुस्लिम मतदाताओं में मतदान को लेकर किसी तरह की दुविधा नहीं दिखी। यही स्थिति यादव मतदाताओं के बीच भी दिखी। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि मुस्लिम बहुल इलाकों में बूथों पर लंबी कतार भी दिखी। इन समीकरणों को देखते हुए कुर्मी और दलित मतों की भूमिका बढ़ गई और पूरा चुनाव इस पर निर्भर हो गया है कि इनका बिखराव किस तरह से हुआ है।
ध्वस्तीकरण भी रहा मुद्दा
सड़क निर्माण तथा अन्य विकास कार्यों के लिए मकान एवं दुकानों के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई लगाता जारी है। शहर ही नहीं सोरांव, फूलपुर आदि क्षेत्रों में भी मकान गिराए गए हैं। इसका असर चुनाव में भी दिखा। इससे प्रभावित मतदाता भाजपा से नाराज दिखे। मुट्ठीगंज के संदीप केसरवानी का कहना था कि ध्वस्तीकरण की चपेट में ज्यादातर व्यापारी आए हैं, जो भाजपा का कोर वोटर है लेकिन इस बार उनमें नाराजगी दिखी।