विशेषज्ञों का मानना, उपचुनाव आमतौर पर सत्ता का होता है, ऐसे में मतदाताओं की बेरूखी का भाजपा को नुकसान हो सकता है। भाजपा के दीपक पटेल व सपा के मुजतबा सिद्दीकी के बीच है नजदीकी मुकाबला, कम मतदान से बन-बिगड़ सकता है खेल।
जानकार और राजनीतिक दल फूलपुर विधानसभा उपचुनाव में कम मतदान के अपने-अपने निहितार्थ निकाल रहे हैं। इससे खासतौर पर भाजपा की चिंता बढ़ गई है। उपचुनाव आमतौर पर सत्ता पक्ष का माना जाता है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि कम मतदान प्रतिशत से सत्ता पक्ष को नुकसान हो सकता है। फूलपुर विधानसभा के लिए बुधवार को मात्र 43.45 प्रतिशत मतदान हुआ। यह 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में करीब 17 फीसदी कम है। फूलपुर विधानसभा की बात करें तो यह अब तक का सबसे कम मतदान है।
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पिछले लोकसभा चुनावों को भी शामिल कर लें तो 2018 के उपचुनाव में कुल 37.15 प्रतिशत वोट पड़े थे। इसमें भी फूलपुर विधानसभा में 46.32 फीसदी वोट पड़े थे। अन्य लोकसभा चुनावों में भी फूलपुर विधानसभा में 50 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है। यानि, लोकसभा चुनाव में भी इस विधानसभा में कभी इतने कम वोट नहीं पड़े। इससे दलों और प्रत्याशियों के सभी सियासी समीकरण उलझ गए हैं। इस सीट पर भाजपा के दीपक पटेल और सपा के मुजतबा सिद्दीकी के बीच नजदीकी मुकाबला बताया जा रहा है। ऐसे में मतदान में कमी का नतीजे पर बड़ा प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है।
इसे देखते हुए दोनों दल बूथवार पड़े मतों की समीक्षा में लगे हैं और अपने-अपने तर्क बना रहे हैं। हालांकि, पूर्व के चुनावों के अनुभव के आधार पर इससे भाजपा को अधिक नुकसान की बात कही जा रही है। सीएमपी में राजनीति विज्ञान के अध्यापक डॉ. संजय पांडेय का कहना है कि उपचुनाव को लेकर लोगों में खास उत्साह नहीं रहता। इस चुनाव का सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने जा रहा है। यह लोगों को भी पता है। इसलिए कम लोग निकले। यह पहले भी देखा गया है कि उपचुनाव में कम वोट पड़ते रहे हैं।
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इसका कोई अध्ययन तो नहीं हुआ है कि कम मतदान से किसे ज्यादा नुकसान होता है लेकिन किसी भी चुनाव में मतदाताओं में उत्साह न होना सत्ता पक्ष के लिए अच्छा नहीं होता।