शाम छह बजे संगीतोत्सव की शुरूआत सिक्किम के कलावती सुब्बा एवं दल घांटू लोकनृत्य से हुई। इसके बाद छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य को लेकर कलाकार मंच पर आए। इस लोकनृत्य के माध्यम से मानवता को प्रदर्शित किया गया।
एनसीजेडसीसी परिसर में रविवार की शाम सुर, स्वाद और शिल्प के समागम में रेला उमड़ पड़ा। पंजाबी तड़का, गुजराती ढोकला के स्वाद के बीच सूफी गायक नियाजी बंधुओं की कव्वाली पर लोग झूम उठे। महाराष्ट्र के लावणी और झारखंड के छऊ लोक नृत्य की थिरकन ने लोगों के जोहनोदिल पर छाप छोड़ दी।
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शाम छह बजे संगीतोत्सव की शुरूआत सिक्किम के कलावती सुब्बा एवं दल घांटू लोकनृत्य से हुई। इसके बाद छत्तीसगढ़ के पंथी नृत्य को लेकर कलाकार मंच पर आए। इस लोकनृत्य के माध्यम से मानवता को प्रदर्शित किया गया। फिर, महाराष्ट्र के लावणी और झारखंड के छऊ लोकनृत्य पर श्रोताओं ने खूब उत्साह बढ़ाया। खचाखच भीड़ के बीच जब मंच पर शहिद नियाजी आए तो लोगों ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया।
उन्होंने शुरुआत मौला अली पर आधारित कौव्वाली से की। उनकी कव्वाली के बोल ये घर भी हमारा है, वो घर भी हमारा है... तो खूब सराहा गया। इसके बाद उन्होंने कई कव्वाली और गजलें प्रस्तुत कीं। इससे पहले शिल्प हाट में लगे 150 स्टालों पर अपनी पसंद की वस्तुएं निहारने और खरीदने के लिए महिलाओं, युवाओं और बच्चों की भीड़ लगी रही। रविवार को साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से अन्य दिनों के मुकाबले भीड़ अधिक होने से देर शाम तक परिसर में खड़ा होने तक की जगह नहीं बची थी।