फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हजारों में वेतन, करोड़ों के बंगले

Tue, 10 May 2016 02:22 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
इलाहाबाद में बंगला - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
अल्लापुर के अनुपम कुमार एक निजी कंपनी में अफसर हैं। महीने में एक लाख रुपये वेतन मिलता है। पांच लोगों के परिवार में दो बच्चों के स्कूल की फीस, महीने का राशन, कपड़े, मनोरंजन, बिजली का बिल, रसोई गैस, बीमार पिता के महीने भर की दवाओं, मकान के किराये समेत अन्य जरूरतों पर इतना खर्च हो जाता है कि दस की नौकरी पूरी करने बाद भी शहर में अपना मकान नहीं खरीद सके। वहीं, उनके घर से चंद कदमों की दूरी पर सरकारी सेवा में तैनात क्लास-टू के एक अफसर का बंगला है, जिसे नौकरी मिले पांच साल ही बीते हैं और हर महीने हाथ में 55 हजार रुपये तनख्वाह आती है। बताने की जरूरत नहीं कि इतने कम समय में सरकारी अफसर ने यह बंगला कैसे बनवा लिया। 
विज्ञापन


एलनगंज स्थित चर्चलेन, जॉर्जटाउन, स्टेनली रोड स्थित रुद्राक्षपुरम, लूकरगंज, दरभंगा कॉलोनी, मैरी लूकस स्कूल के सामने वाली गली, लोकसेवा आयोग के सामने कस्तूरबा गांधी मार्ग, सिविल लाइंस में ताशकंद मार्ग समेत शहर के अन्य पॉश इलाकों में एडीएम और एसडीएम स्तर के दर्जनों अफसरों, बिजली, सिंचाई, लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंताओं, अधीक्षण अभियंताओं, वाणिज्य कर विभाग के अफसरों, तहसीलदारों, चकबंदी अफसरों, बीडीओ, पुलिस अफसरों, निबंधन विभाग के सब रजिस्ट्रार और उससे ऊपर के अफसरों के बंगले लाइन से बने दिख जाएंगे। इन बंगलों की औसतन कीमत दो से पांच करोड़ रुपये तक है और कई अफसरों के पास तो पांच करोड़ रुपये से भी ऊपर के बंगले हैं लेकिन इन्हें बनवाने वालों का वेतन 50 हजार से 90 हजार के बीच है। हालांकि ज्यादातर घरों के बाहर लगी नेम प्लेट पर अफसरों के बजाय उनकी पत्नी या घर के किसी दूसरे सदस्य का नाम लिखा हुआ मिलेगा। ऐसे घरों में नेम प्लेट तभी बदलती है, जब अफसर रिटायर हो जाते हैं। नौकरी के बाद भले ही जांच हो लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता। वह जानते हैं कि पेंशन उनका अधिकार है और सरकारी जांच से कुछ नहीं होने वाला।

जीवन भर पूरा वेतन बचाएं तो भी न बने बंगला
सामान्य सी बात है कि 90 हजार रुपये वेतन पाने वाले अफसर को नौकरी की शुरुआत में इतनी तनख्वाह नहीं मिलती रही होगी। अगर अफसर अधिकतम 33 साल की पूरी सेवा करता है और उसे इस पूरे सेवाकाल के दौरान महीने में औसतन 60 हजार रुपये वेतन मिलता है तो 33 साल तक वेतन का एक रुपया भी खर्च न करने पर उसके पास तकरीबन दो करोड़ 37 लाख 60 हजार रुपये की बचत होगी, जो मुमकिन नहीं है जबकि शहर में इस श्रेणी के अफसरों ने जो बंगले बनवाए हैं, उनकी कीमत दो से पांच करोड़ रुपये तक है। साफ है कि ये बंगले वेतन से नहीं बल्कि उस रकम से तैयार किए गए हैं, जिसका कोई लेखाजोखा नहीं है। सिर्फ इन बंगलों का हिसाब मांग लिया जाए तो अफसर आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंस जाएं।
विज्ञापन


बड़े पैमाने पर फ्लैट्स में भी निवेश
शहर के पॉश इलाकों में सरकारी अफसरों के बंगले दिख जाना आम बात है लेकिन अफसर अब बड़े पैमाने पर फ्लैट्स में भी निवेश कर रहे हैं। जॉर्जटाउन, सिविल लाइंस, लूकरगंज सहित शहर के कई इलाकों में बनी बहुमंजिला इमारतों में इन अफसरों ने फ्लैट्स खरीद रखे हैं। रजिस्ट्री घर के किसी दूसरे सदस्य के नाम है। बहुत कम फ्लैट्स हैं, जहां अफसरों का परिवार रहता है। ज्यादातर फ्लैट्स किराए पर उठाए गए हैं।

बंगला होने के बाद भी सरकारी आवास ठिकाना
शहर में कई ऐसे सरकारी अफसर हैं जिनके पास इलाहाबाद में बंगले हैं, लेकिन उन्होंने सरकारी आवास को अपना ठिकाना बना रखा है। दअरसल, ये अफसर नहीं चाहते कि किसी की इन पर नजर पड़े। अफसरों के सरकारी आवास भी किसी बंगले से कम नहीं होते हैं और वहां सभी सरकारी सुविधाएं भी मुफ्त मिलती है, सो कई अफसर अपना घर होने के बावजूद सरकारी आवास में ही रहते हैं।

लोकायुक्त की नियुक्ति का भी असर नहीं 
प्रदेश में लोकायुक्त की नियुक्ति भी हो गई है, लेकिन अब तक आय से अधिक संपत्ति के मामले में कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। निकट भविष्य में भी इसके कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। लोकायुक्त की नियुक्ति से पहले भी यही स्थिति थी। पिछले तीन दशक का रिकार्ड देख लिया जाए तो शायद ही कोई अफसर आय से अधिक संपत्ति के मामले में फंसा होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें