कैशलेस अर्थव्यवस्था के दावों के बीच उपजी अव्यवस्था तथा दर्द झेल रहे लोगों के ये केवल कुछ उदाहरण मात्र नहीं हैं। बड़ी संख्या में लोगों को रोजाना इस तरह की दुरुह स्थिति से गुजरना पड़ रहा है। स्वरूपरानी अस्पताल पहुंचे धीरेंद्र कुमार, अल्लापुर के अरविंद सिंह आदि तो दवा नहीं मिलने पर रो पड़े। उनके मरीज की स्थिति काफी खराब थी।
नोटबंदी के झटके से 45 दिन बीत जाने के बावजूद लोगों को राहत नहीं मिली है। सबसे अधिक परेशानी मरीजों को है। उनके लिए डॉक्टर की फीस, जांच कराना और भर्ती होने पर अस्पतालों का बिल चुकाना मुश्किल हो रहा है। कई तो उपचार भी नहीं करा पा रहे। हालांकि कुछ अस्पतालों ने चेक, एटीएम से भी बिल लेने की व्यवस्था कर रखी है लेकिन ऐसे गिनती के हैं। सरकार ने सरकारी अस्पतालों और दवा की दुकानों पर पुराने नोटों की लेने की छूट दे रखी थी लेकिन अब वह भी बंद है। ऐसे में लोगों की परेशानी और बढ़ गई है।
इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. आलोक मिश्र कहते हैं कि अभी अधिकतर अस्पतालों में स्वैप मशीन नहीं है। हालांकि चेक लिए जा रहे हैं लेकिन बहुत सारे मरीज ऐसे आ रहे हैं जिनके पास न तो चेक है और न ही एटीएम। इसके चलते उन्हें परेशानी है। ड्रग एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल द्विवेदी कहते हैं कि नोटबंदी के चलते दवा का कारोबार पहले के मुकाबले 50 फीसदी रह गया है।