टिमटिमाते चिराग की धुंधली रोशनी में पहली बार नाती को देखा
पुस्तक में नेहरू के करीबी रहे और आनंद भवन की देखरेख करने वाले मुंशी कन्हैया लाल ने 1944 की एक अविस्मरणीय घटना का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा है कि नौ अगस्त 1942 को पंडित नेहरू को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पेश करने के संबंध में चार साल की कैद मिली। वह अहमदनगर किले में नजरबंद कर दिए गए। बाद में उन्हें अल्मोड़ा जेल भेजने का आदेश हुआ। यह सूचना गुप्त रखी गई। अहमदनगर से अल्मोड़ा के रास्ते में एक रात नैनी जेल में विश्राम था। उनके आने की खबर लोगों को न लगे, इसलिए गाड़ी नैनी स्टेशन से कुछ दूर रोकी गई।
इस अवधि में इंदिरा गांधी के बड़े पुत्र राजीव का जन्म हो चुका था लेकिन पंडित नेहरू ने अपने नाती को देखा नहीं था। इंदिरा पुत्र राजीव सहित पिता से मिलने पहुंचीं, जहां गाड़ी रुकी थी। वहां न तो बिजली की रोशनी थी और न कोई को लैंप आदि ही था। पंडित नेहरू ने एक टिमटिमाते चिराग की धुंधली रोशनी में दूर से अपने प्रिय नाती को देखा और आशीर्वाद दिया।