इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक दायित्व सौंपा गया है तो उन्हें पहले न्यायिक मामलों का निस्तारण करना होगा। प्रशासनिक व्यस्तता के नाम पर न्यायिक कार्य को लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। न्यायिक कार्य निर्धारित अनुशासन और समय-सारणी के अनुसार प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने अमर सिंह यादव की याचिका पर दिया है।
मामला माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत कानपुर नगर में लंबित प्रकरण से संबंधित है। सुनवाई के दौरान एसडीएम सदर, कानपुर नगर की ओर से दाखिल रिपोर्ट में बताया गया कि एक जुलाई से 21 जुलाई 2026 तक प्रशासनिक व्यस्तता के कारण मामले की सुनवाई नहीं हो सकी। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि लगातार 21 दिनों तक प्रशासनिक कार्यों का हवाला देकर न्यायिक कार्य को रोकना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक दायित्व पीठासीन अधिकारी की सुविधा पर निर्भर नहीं हो सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को न्यायिक जिम्मेदारियां सौंपना उचित व्यवस्था नहीं है। राज्य सरकार को सुझाव दिया कि ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए प्रशिक्षित और पेशेवर न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति पर विचार किया जाना चाहिए। मामले के शीघ्र निस्तारण के लिए हाईकोर्ट ने कानपुर नगर के संबंधित ट्रिब्यूनल को सप्ताह में तीन प्रभावी सुनवाई की तारीखें तय करने और आवश्यक आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 15 सितंबर 2026 की तारीख तय करते हुए एसडीएम कानपुर नगर से स्थिति रिपोर्ट भी तलब की है। रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश की प्रति 24 घंटे के भीतर प्रमुख सचिव, समाज कल्याण विभाग और संबंधित एसडीएम तक पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।