पति ने पत्नी पर किसी तरह की अमानवीय यातना देने जैसा न तो आरोप लगाया है और न ही मामले में ऐसा कोई तथ्य उजागर हो रहा है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की विधि व्यवस्थाओं का हवाला भी दिया। कहा कि क्रूरता का आकलन पीड़ित पति या पत्नी पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश पर मुहर लगाते हुए पति की 14 साल पुरानी अपील खारिज कर दी। साथ कहा कि सास-ससुर की सेवा से इन्कार करने को तब तक क्रूरता नहीं माना जा सकता, जब तक घर के हालातों का सटीक आकलन न किया जाए। लेकिन, किसी के घर की ऐसी स्थिति की सटीक जांच करना अदालत का काम नहीं है।