सूबे के पुलिस कर्मियों के लिए यह राहत भरी खबर है। अब अफसर की नाराजगी उनको बर्खास्तगी के रूप में नहीं झेलनी होगी। बर्खास्त करने से पूर्व बाकायदा इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया को अपनाना होगा। हाईकोर्ट ने सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर रैंक के पुलिसकर्मियों की ऐसी बर्खास्तगी को अवैध करार दिया है जो अधिकारियों के सीधे आदेश से कर दी जाती है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि ऐसा बर्खास्तगी आदेश, जिसमें आरोपी कर्मचारी को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया, उसके खिलाफ रिवीजन या अपील दाखिल करने के लिए कर्मचारी को विवश नहीं किया जा सकता है।
सिपाही सत्येंद्र कुमार वर्मा की अपील पर फैसला सुनाते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश वीके शुक्ल और न्यायमूर्ति यूसी श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि अपराध चाहे जितना बड़ा हो अधिकारी को बर्खास्तगी आदेश जारी करने से पूर्व स्पष्ट करना होगा कि उसने कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई या जांच की आवश्यकता क्यों नहीं समझी। याची के अधिवक्ता विजय गौतम ने कोर्ट को बताया कि पुलिसकर्मचारी अपील एवं दंड नियमावली के नियम 8 (2)(बी) के तहत बर्खास्तगी का आदेश विरलतम से विरल मामलों में ही दिया जा सकता है। आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना बर्खास्त करना असंवैधानिक है। कोर्ट ने दलील स्वीकार करते हुए तीन मार्च 2016 के बर्खास्तगी आदेश और पांच मई 2016 के एकल न्यायपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है।
प्रकरण के अनुसार याची सत्येंद्र ने तीन मार्च 2016 को मेरठ के लालकुर्ती थाना क्षेत्र में यूपी बोर्ड की परीक्षा के दौरान लैब सहायक नागेंद्र कुमार की सरकारी राइफल से गोली मारकर हत्या कर दी थी। उस समय वह नशे की हालत में था। इस घटना में एक व्यक्ति घायल हुआ था। हालात के मद्देनजर एसएसपी मेरठ ने सत्येंद्र वर्मा को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।