अबकी कुंभ के स्नान पर्वों के लिए प्रशासन को किसी भी तरह के रिहर्सल का मौका नहीं मिलने वाला है। संगम की रेती पर स्नानपर्वों की शृंखला में आमतौर पर पौषपूर्णिमा पहला स्नान पर्व होता है फिर तकरीबन सप्ताहभर बाद मकर संक्रांति को बड़ी संख्या में स्नानार्थी जुटते हैं।
ऐसे में पौष पूर्णिमा को औपचारिक तरीके से भले ही मेले की शुरुआत माना जाता हो लेकिन स्नानघाटों, चकर्ड प्लेटों, बिजली, पानी, शौचालय, रास्ता, रैनबसेरा आदि की व्यवस्थाएं पूरी होने में मकर संक्रांति तक का समय लग जाता था। इस बार ऐसा नहीं होगा।
पहला स्नान पर्व, मकर संक्रांति, अखाड़ों के शाही स्नानपर्वों में से एक है और इसी से मेले की शुरुआत होगी। दूसरा स्नानपर्व पौष पूर्णिमा तेरह दिनों बाद है। अखाड़े कुंभ मेले केसिरमौर होते हैं, सो पहले स्नानपर्व तक मेला क्षेत्र को पूरी तरह से तैयार होना चाहिए। अखाड़ों के स्नान के लिए तो उनके शिविर से लेकर स्नानघाट तक बैरीकेडिंग के साथ चकर्ड प्लेटें बिछाई जानी जरूरी हैं ताकि उनके निशान और महामंडलेश्वरों की गाड़ियां स्नानघाट तक पहुंच सकें।
अर्द्धकुंभ में अखाड़ा परिषद के प्रवक्ता रहे निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत रामानंद पुरी का कहना है कि आमतौर पर 15 दिसंबर तक सभी तरह की व्यवस्थाएं पूरी हो जानी चाहिए। भूमि आवंटन में ही काफी देरी हुई, ऐसे में अब तक अखाड़ों की जमीन और स्नान के लिए ‘ट्रैक’ पर अभी जगह-जगह या तो गड्ढे हैं या फिर बालू के ढेर लगे हैं। समतल भूमि न होने पर अखाड़ों को छावनी बसाने में भी काफी दिक्कतें आ रही हैं।
प्रयाग धर्म संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल के मुताबिक कुंभ के लिहाज से अब तक जो चीजें पूरी हो जानी चाहिए थीं, सभी बिंदुओं पर अधूरी हैं। चकर्ड प्लेटों का बिछना तो दूर, खुले में डेरा जमाए संतों को पानी और बिजली के लिए भी परेशान होना पड़ रहा है। कुंभ मेले के दौरान मेले से जुड़े मोहल्लों में भी कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता रहा है, अभी मेले में ही ऐसी व्यवस्था पूरी नहीं हो सकी है। लगता नहीं कि पहले शाही स्नान तक भी सब ठीक हो सकेगा।