अब होली के रंग और मस्ती के मायने भले ही बदल गए हों, कभी होली का मतलब बसंतोत्सव ही होता था। हुड़दंग में किसी को परेशान करने की दुर्भावना नहीं बल्कि उत्सव का आनंद होता था। लोकनाथ चौराहे और अतरसुइया बड़ा पार्क में टेसू के फूलों से बने रंग बड़े-बड़े ड्रम में भरे होते थे। शुरुआत अबीर-गुलाल से होती थी, फिर रंग डाला जाता था। रिश्तों का रंग तो था ही, महिलाओं की टोलियां अलग होती थीं। डीएम के आदेश पर दोपहर बारह बजे सायरन बजने के साथ ही रंग खेलना बंद हो जाता था। हर चौराहे पर रंगों के ड्रम भरे होते। इसमें से कोई भी रंग लेकर किसी को भी डुबो सकता था। चौक, नखासकोहना, भारती भवन, कोतवाली, हीवेट रोड, मोहत्सिमगंज, रामबाग, साउथ मलाका में ऐसे ही रंगों की धूम होती थी।
रचनाकारों की होली का रंग सबसे जुदा था। मुट्ठीगंज से मुंडा इक्का पर ढोल, मजीरा के साथ गीत गाते साहित्यकारों की टोली निकलती तो अजब नजारा होता था। उमाकांत मालवीय, गोपीकृष्ण गोपेश, सुरेशव्रत राय, रविनाथ सारस्वत, अमरनाथ श्रीवास्तव, कैलाश गौतम, जगन्नाथ सहाय वर्मा जैसे रचनाकार जब लोकनाथ पहुंचते तो अमृत राय, जगदीश गुप्त, केशवचंद्र वर्मा, विजयदेव नारायण साही भी उनके साथ शामिल हो जाते। अश्क, नरेश मेहता, मलयज, श्रीराम वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी, रघुवंशजी भी होली के रंगों में जमकर डूबते थे। कथाकार दूधनाथ, लूकरगंज से रंगों में भीगते हुए भारती भवन, लोकनाथ स्थित लक्ष्मीधर मालवीय के घर पहुंचते।
होली की चर्चा चली तो अजामिल बोले, निराला जी भी ऐसे जमकर रंग खेलते कि उनकी दाढ़ी पूरी तरह से लाल हो जाती थी। जगदीश गुप्त जी तो होली के रंगों में डूबते ही थे। नागवासुकि पर जमावड़ा होता और खाने को तरह-तरह के पकवान होते थे। होली के बाद अहियापुर में गोपी शुक्ल के शिवाला पर शाम को संगीत का दौर चलता तो फगुआ गीतों की बौछार होती। बाबा अभय अवस्थी ने कहा, जीरो रोड वाले घर से गले में ढोल लटकाकर फाग गाते हुए होली खेलने निकलने वाले बच्चन को मोहल्ले के बुजुर्ग अब भी याद करते हैं।
यश मालवीय ने याद किया, गुझिया-पापड़ के साथ सभी का स्वागत करती महादेवी, होली को अलग अर्थ देती थीं। महादेवी के आवास से कोई भी बिना अबीर-गुलाल और गुझिया-पापड़ खाए नहीं लौटता था। होली मिलन का क्रम तो कई-कई दिनों तक चलता रहता था। प्रोफेसर अनिता गोपेश ने जोड़ा, बचपन की होली अब तक नहीं भूली है लेकिन इसमें होली के बहाने कोई शरारत, दुर्भावना नहीं होती थी। कालिख पोतने का रिवाज तो बिलकुल ही नहीं था। लोग मन का बैर भुलाकर मिलते और उत्सव का आनंद लेते थे। अब होली है लेकिन मन नहीं तन को भिगोने के लिए।