मानव सभ्यता के शुरूआती दिनों में प्रकृति और मानव के बीच का जुड़ाव बहुत गहरा रहा है। प्रकृति की महत्ता को समझ कर लोगों ने उसे देवी देवताओं के तुल्य माना और पेड़-पौधों एवं नदियों की पूजा अर्चना करते रहे। यह क्रम सभ्यता के विकास के साथ भी जुड़ा लेकिन इस विकास क्रम के बीच लोगों की हसरतें बढ़ती गईं और वह प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करने के बजाए दोहन में जुटे रहे। यहां तक कि नदियों के किनारे उगे पेड़ पौधे उजड़ गए।
नए पेड़ लगाए नहीं गए। नदियों के पास सनातनी परंपरा वहन करने वाले संतों ने भी अनदेखी की। यही कारण है कि कभी हरा-भरा रहना वाले दारागंज, झूंसी, गऊघाट, अरैल सहित गंगा और यमुना के किनारे धीरे-धीरे खुले मैदान में तब्दील हो गए और अब वहां कंक्रीट का जंगल तैयार हो रहा है। इससे पर्यावरण संकट खड़ा हुआ और गंगा-यमुना के संगम की सुंदरता भी कम हुई है। संतों ने दावा किया है कि वह अब लोगों के सहयोग से नदियों के किनारे पर नए पौधे तैयार कराएंगे। तैयार होने के बाद पेड़ों को गंगा-यमुना के किनारों पर लगाया जाएघा ताकि प्राकृतिक सुंदरता फिर लौट आए।
इलाहाबाद और उसके आसपास के जिलों में गंगा और यमुना के किनारे पर अखाड़ों से जुड़े सैकड़ों संतों, महात्माओं के आश्रम और धार्मिक एवं कई ऐतिहासिक स्थल हैं। गंगा के किनारे नागवासुकि, ब्रह्मेश्वर महादेव मंदिर दशाश्वमेधघाट, जंगमबाड़ी मठ, निरंजनी अखाड़ा आश्रम, हरित माधव संगम क्षेत्र स्थित बड़े हनुमान मंदिर तो यमुना के किनारे जूना अखाड़ा का मौजगिरि आश्रम, मनकामेश्वर मंदिर, तक्षकेश्वर महादेव मंदिर, बलुआघाट स्थित इस्कान मंदिर आदि हैं। इन इलाकों में बड़ी संख्या में संतों ने अपने आश्रम बना रखा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की अध्यक्षता में हुई बैठक में पौधरोपण कराने का निर्णय लिया गया है। अखाड़ों के संत जन सहयोग से नदियों के किनारे बड़ी संख्या में पेड़ तैयार कराएंगे। महंत नरेंद्र गिरि के मुताबिक नदियों के किनारे नीम, पीपल, बरगद, देशी आम के पेड़ लगाए जाएंगे।
‘बांध बनने से पहले तक अलोपीबाग से लेकर बक्शी बांध, शिवकुटी गंगा के किनारे और किलाघाट से लेकर बरगदघाट तक यमुना के किनारे घना जंगल था। माघ मेले का स्टोर जिस स्थान पर है वहां पर भी विशाल वृक्ष थे लेकिन धीरे-धीरे यह वीरान हो गया और अब तो गिने चुने पेड़ ही रह गए हैं।’ महंत स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी टीकर माफी
‘संगमनगरी बाग और विशाल वृक्षों से भरी पूरी थी। कुंभ पर्व के दौरान विशाल वृक्षों के नीचे संत महात्मा बैठते थे। अब गंगा-यमुना के किनारे वीराने नजर आते हैं।’ महंत देवेंद्र सिंह शास्त्री श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा
‘तक्षक तीर्थ आने वाले भक्तों को पर्यावरण संतुलन के लिए प्रेरित कर रहा है। पांच पेड़ तैयार कराने वाले के लिए तक्षकेश्वर महादेव मंदिर में नि:शुल्क विशेष पूजा अनुष्ठान किया जाएगा।’ रविशंकर तक्षक तीर्थ पीठाधीश्वर