‘जिंदगी मैंने नहीं गुजारी सभी की तरह, हर इक पल को जिया पूरी इक सदी की तरह’ कहने वाले पद्मभूषण गोपालदास नीरज का जाना गीत को कहने-सुनने और उसे जीने वालों को जिंदा मार गया है। इलाहाबाद से उनका गहरा नाता रहा। कहते थे, यहां की बात ही कुछ और है। यहां आते ही व्यक्ति के भीतर का कवि और साहित्य जाग जाता है। यही वजह है कि जब कभी भी इलाहाबाद से कोई न्योता गया, तमाम अड़चनों को दरकिनार करते हुए नीरज आना नहीं भूले।
‘अमर उजाला’ से पिछली मुलाकात में उन्होंने कहा था, गीत कभी मरेंगे नहीं क्योंकि छंद हमारी सांसों में पूरी तरह से रचे-बसे हैं। जहां तक फूहड़ गीतों, कविताओं की बात है, तो उसे भी दूर करने की जिम्मेदारी हमारी ही है। हम अच्छा प्रस्तुत करेंगे तो लोग उसका स्वागत करेंगे। जरूरी है कि मंचों पर अच्छी रचनाओं के साथ ही आया जाए। हमेशा से ऐसा ही होता आया है। नीरज ने फिल्मी गीतों को भी साहित्य का दर्जा देने की वकालत की थी। नीरज वह नाम है, जिनकी बनाई जमीन पर गीत लिखे जा रहे हैं।
तीस जून 2013 को वह अंतिम बार इलाहाबाद आए थे। कैलाश गौतम सृजन संस्थान की ओर से सांस्कृतिक केंद्र में हुए आयोजन में उन्हें पहले ‘कैलाश गौतम काव्य कुंभ सम्मान’ से नवाजा गया था। राहत इंदौरी, डॉ.उदय प्रताप सिंह सरीखे तमाम नामचीन मंच पर थे। इससे पहले वह मार्च 2012 में हाईकोर्ट के अधिकारी-कर्मचारी संघ के कवि सम्मेलन-सम्मान समारोह और 22 जनवरी 2009 को ट्रिपल आईटी की ओर से सांस्कृतिक केंद्र में हुए कवि सम्मेलन में आए थे। आज भी इलाहाबादियों को याद है, त्रिवेणी महोत्सव का वह मंच, जब उनके आते ही देर तक तालियां गूंजतीं ही रहीं।
वह जब भी इलाहाबाद आते, नए से नए कवियों से भी आत्मीयता से मिलते। श्लेष कहते हैं, पिताजी के जाने के बाद उन्होंने कहा था, कैलाश नहीं हैं तो मेरी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। यश मालवीय ने जोड़ा, आज उन्हीं की बनाई जमीन पर गीत लिख जा रहे हैं। वह हमेशा हौैसला बढ़ाते और जरूर कहते, पिता वाला गीत पढ़ो, पितृ ऋण से उऋण हो जाओगे। उनकी सहजता ऐसी थी कि एक बार महादेवी जी के घर चलने की जिद की तो मैंने कहा, मेरे पास स्कूटर है, चलेंगे? तो झट बोले, महादेवी जी के यहां चलना है, नंगे पैर चल सकते हैं। नीरज नहीं रहे तो सबकी आंखें नम हैं, चाहे गीत को कहने वाला हो या फिर सुनने वाला।
आंखें नम कर गया नीरज का जाना
बच्चन जी के बाद नीरज ने ही मंच पर कविता को जिंदा रखा। अठारह बरस की उम्र में ‘कारवां गुजर गया’ जैसा गीत लिखने वाले नीरज ने गीत की सत्तर बरस की लंबी पारी खेली। शब्द-सरोकार का अद्भुत समन्वय थे नीरज। वह अपनी शर्तों पर जिये। उन्होंने रचना के स्तर पर कभी समझौते नहीं किए। वह हिन्दी गीत की आबरू थे।
0 यश मालवीय
उनके साथ गीत के एक युग का अंत हो गया। अपनी आन-बान, शान बनाए रखते हुए उन्होंने फिल्मों में भी कदम रखा और खूब कामयाब रहे। वह मंच की शान थे। उनके साथ गीत विधा का शीर्ष पुरुष चला गया।
0 हरीश चंद्र पांडेय
अगर ‘गीत ऋषि’ जैसा कोई शब्द है तो वह सिर्फ नीरज जी के लिए ही लिखा जा सकता है। छंदात्मक कविताओं, गीतों से समय को परखते हुए सरोकारों के साथ अगर किसी ने संवाद किया तो वह नीरज ही थे। उनकी उपस्थिति सिद्ध करती थी कि यह मंच अभिव्यक्ति के साथ स्तरीयता और पवित्रता का मंच भी है।
0 डॉ.श्लेष गौतम
नीरज जी गीत की शान थे। वह जितने अच्छे गीत लिखते थे, उतने ही शानदार अंदाज में उसे मंचों पर प्रस्तुत करते थे। मंच पर उनकी अलग और अनूठी छाप थी। एक सहज, जिंदादिल गीतपुरुष अलविदा कह गया।
0 अजामिल
नीरज जी का जाना गीतों की लयात्मकता का जाना है। चाहे फिल्मी गीत हों, या मंचीय कविताएं, सामाजिक सरोकारों के साथ उसका शिल्प और विधान रचना उनके ही बस की बात रही।
0 नंदल हितैषी
उनके जाने से गीत के एक युग का अंत हो गया। वह युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत थे। तीन बार अलग-अलग आयोजनों में उन्हें आमंत्रित करने का अवसर मिला। हर बार उनका स्नेह, उनका आशीर्वाद मिला।
0 शैलेंद्र मधुर
हमने साहित्य की धरोहर को खो दिया। नीरज जी का जाना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है।
0 महंत नरेंद्र गिरि, अध्यक्ष, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद
नीरज जी से कितनी मुलाकातें, कितनी बातें हुईं, याद नहीं। एक बार जब हम स्टेशन पर उन्हें विदा करने पहुंचे तो उनके कंधे पर सिर्फ एक झोला था। पूछा, बाकी सामान तो उन्होंने कहा था, ट्रेन और जिंदगी, दोनों के सफर के लिए याद रखना, ‘जितना कम सामान रहेगा,सफर तेरा आसान रहेगा/जितना भारी बक्सा होगा,उतना तू हैरान रहेगा।’ ये पंक्तियां आज भी मेरे लिए जीवन दर्शन हैं।
0 डॉ.नीरज त्रिपाठी, सर्जक-सर्जन
नीरज के निधन से एक युग का अंत
गुफ्तगू अध्यक्ष इम्तियाज अहमद गाजी ने कहा है कि पत्रिका के लिए लिया गया उनका इंटरव्यू किसी दस्तावेज की तरह है। सचिव नरेश महरानी,प्रभाशंकर शर्मा, शिवपूजन सिंह, अनिल मानव, शाहिद इलाहाबादी, सागर होशियार आदि ने कहा, उनके जाने से एक युग का अंत हो गया।