सुरों और लोकनृत्यों ने बांधा समां
सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ विपिन मिश्रा की शंख-डमरू वादन से हुआ। इसके पश्चात पद्मश्री मालिनी अवस्थी जी ने मां गंगा को नमन करते हुए जब “मोरे राम जोगिनी बनूंगी” गाया तो पंडाल करतल ध्वनि से गूंज उठा।रेलिया बैरन पिया को लिए जाए रे, मोरे अंगना भवानी आई , हो रामा हो रामा, “केसरिया बालम पधारो म्हारे देस,जैसे गीतों ने शाम को भक्तिरस व लोकधुनों की मिठास से भर दिया। राजा जनक के हारे भीड़ और होली खेले मसाने में और “सावन आया रे, मेघ छाए रे, प्रस्तुत कर समां बांध दिया।
लोकनृत्यों की कड़ी में असम से आई स्वागता शर्मा एवं दल ने असम के पारंपरिक नृत्य बिहू की प्रस्तुति देकर वहां की माटी की सुगंध को बिखेरकर खूब तालियां बटोरी। मध्य प्रदेश से आए जुगल किशोर एवं दल ने जनक लियौ रघुरयिया अवध में बाजे बधाइयां गीत पर रगं-बिरंगे परिधान में बधाई, नौरता नृत्य की प्रस्तुति देकर दर्शकों से खूब तालियां बटोरीं।
हरियाणा से आए प्रदीप कुमार बमनी और साथी कलाकारों ने फागुन आया रंग भरा गीत पर फाग नृत्य की प्रस्तुति देकर देवर भाभी के प्रेम को मंच पर जीवंत किया। झांसी से आई राधा प्रजापति एवं दल ने राई नृत्य की प्रस्तुति दी। वही रामबाबू यादव ने बिरहा भेजी राम को वन में रहले कैअव कारण, बनिके मनिहारी श्याम दौरी सिर पर धारी की प्रस्तुति दी।