याची अधिवक्ता ने दलील दी कि यह प्राथमिकी पूरी तरह से प्रतिशोध की भावना से दर्ज कराई गई है और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। हालांकि, अदालत ने केस डायरी में मौजूद साक्ष्यों, विशेष रूप से सीसीटीवी फुटेज का संज्ञान लिया, जिसमें पीड़िता को जबरन बुर्का पहनाए जाने के दृश्य दर्ज थे। न्यायालय ने टिप्पणी की कि वर्तमान समय में समाज में ऐसी प्रवृत्तियां चिंताजनक हैं जहां धर्म को दूसरों पर थोपने का प्रयास किया जाता है।
पीठ ने कहा कि युवाओं को इस उम्र में अपनी शिक्षा और राष्ट्र सेवा पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि ऐसी गतिविधियों में संलिप्त होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अधिनियम के तहत ''प्रलोभन'' और ''अनुचित प्रभाव'' की परिभाषा अत्यंत व्यापक है और यह जांच का विषय है कि क्या याचिकाकर्ताओं के कृत्य इन श्रेणियों में आते हैं। जांच के बीच में हस्तक्षेप करने से इन्कार करते हुए हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर रोक के अंतरिम आदेश को वापस ले लिया है।