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मुल्जिम को नहीं मिला वकील, सुना दी सजा

Thu, 29 Jun 2017 02:02 AM IST
योगेंद्र मिश्र, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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गरीबों को निशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराने की संवैधानिक बाध्यता और दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के बावजूद मुल्जिम को अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए वकील न मिल सका। अपने बचाव में वकील नियुक्त करने में असमर्थ मुल्जिम की न सरकार ने मदद की और न ही अदालत ने ही उसे वकील दिया। लिहाजा बिना बचाव का मौका दिए उम्रकैद की सजा सुना दी गई।  जौनपुर के सरपतेहा थाना क्षेत्र के अनिल कुमार की जेल अपील पर सुनवाई के दौरान यह मामले सामने आया।  
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पता चला कि अभियुक्त के खिलाफ पेश किए  गवाहों से उसकी ओर से कोई प्रतिपरीक्षा नहीं हुई।

ट्रायल कोर्ट ने  प्रतिपरीक्षा हुए बिना उसे उम्रकैद की सजा दे दी गई। अभियुक्त अनिल की जेल अपील पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति भारत भूषण और न्यायमूर्ति पीसी त्रिपाठी की पीठ ने मुकदमा ट्रायल कोर्ट को वापस भेजते हुए अभियुक्त के लिए वकील नियुक्त करने और उसका पक्ष सुनकर फिर से निर्णय देने का निर्देश दिया है। इस दौरान अभियुक्त अनिल कुमार को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।कोर्ट ने कहा कि अपराध की गंभीरता और उसके लिए संभावित सजा ऐसे महत्वपूर्ण बिंदु हैं जिनको ध्यान में रखा जाना चाहिए था। हमेें विश्वास है कि अभियुक्त को कानूनी प्रक्रिया से वंचित किया गया और उसके खिलाफ किया गया ट्रायल दंड प्रक्रिया के प्रावधानों के विपरीत है क्योंकि अभियुक्त को विधिक सहायता नहीं दी गई।

अनिल कुमार पर अपनी पत्नी तारादेवी की हत्या का आरोप है। उसके खिलाफ हत्या, दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्या की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। 28 जुलाई 2011 को ट्रायल कोर्ट ने उसे हत्या और दहेज उत्पीड़न का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुना दी।
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अनिल कुमार ने जेल से ही हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। मगर यहां भी उसका पक्ष रखने के लिए कोई वकील नहीं था। उसका पक्ष रखने के लिए हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायमित्र एमबी माथुर ने कोर्ट को बताया कि ट्रायल में आठ गवाहों के बयान हुए मगर अभियुक्त की ओर से उन गवाहों की प्रतिपरीक्षा (क्रास एक्जामिनेशन) नहीं की गई। अभियुक्त ने अपने बचाव में कोई वकील नहीं किया था। उसने स्वयं भी प्रतिपरीक्षा नहीं की। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 39 ए के तहत सरकार विधिक सहायता देने के लिए बाध्य है। सीआरपीसी की धारा 304 में भी प्रावधान है कि यदि अभियुक्त अपना वकील करने में असमर्थ है तो उसे सरकार वकील उपलब्ध कराएगी। जबकि धारा 303 में अभियुक्त को अपना बचाव करने का अधिकार दिया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह आश्चर्य कि बात है कि ट्रायल जज भी अपने वैधानिक दायित्व का पालन करने में असफल रहे। जबकि सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के तमाम निर्णयों में स्पष्ट निर्देश है कि मुफ्त और समर्थ विधिक सहायता उपलब्ध कराने का उद्देश्य यह है कि ऐसा अभियुक्त जो अपना पक्ष रखने में असमर्थ है का भी मुफ्त और निष्पक्ष ट्रायल हो ताकि आम जनता का न्याय प्रशासन पर भरोसा बना रहे।

‘‘हम भारत सरकार और प्रदेश सरकार से समग्र विधिक सेवा कार्यक्रम शुरू करने की संस्तुति करते हैं क्योंकि यह अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के तहत न सिर्फ समान न्याय देने की लिए जरूरी है बल्कि अनुच्छेद 39 ए के तहत संवैधानिक बाध्यता भी है। ’’खंडपीठ
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