इसके व्यापारिक पहलू की बात करें तो चलती-फिरती दुकान के मालिक भी मालामाल हो रहे हैं। वह कुछ ही घंटों में हजारों का कारोबार कर रहे हैं। बैरहना के पंकज कुमार विश्वकर्मा परास्नातक हैं। नौकरी नहीं मिली। जिम्मेदारी थी, इसलिए उन्होंने 2011 में सड़क किनारे पन्नी टांगकर टोपी, चश्मा, रुमाल, बेल्ट और पर्स समेत अन्य सामान बेचने लगे। लेकिन, आए दिन उन्हें पुलिस और नगर निगम वाले खदेड़ देते थे। इसके बाद वह एक पुरानी मैजिक खरीदी।
मोडिफाई करा उसपर दुकान सजा ली। अब वह घूम-घूमकर व्यापार करते हैं। शाम के समय अक्सर मेडिकल चौराहे पर दिख जाएंगे। इसी तरह गोविंदपुर निवासी सचिन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सामने वैन पर मोबाइल फोन के क्लास, बैक कवर, ईयर फोन की दुकान लगाते हैं। वह भी पहले तेलियरगंज मजार चौराहे पर दुकान लगाते थे। वह बताते हैं कि चार से पांच हजार रुपये का कारोबार हो जाता है। किसी-किसी सामान पर 30 से 40 फीसदी फायदा होता है।
त्रिपुरा, लुधियाना, दिल्ली से लाते हैं माल
दुकानदार त्रिपुरा, लुधियाना और दिल्ली से थोक में सामान लाते हैं। चूंकि, उन्हें किराया, बिजली समेत अन्य खर्च नहीं वहन करने होते हैं इसलिए वह सस्ते में सामान बेचकर भी मुनाफा कमा लेते हैं। राजापुर निवासी सईद अजीम भी वैन पर कपड़े बेचते हैं। उनकी वैन अधिकतर सोहबतियाबाग स्थित संगम पेट्रोल पंप के पास लगती है। वह कहते हैं, यहां पर दुकानों का किराया 15 से 20 हजार रुपये है। वह खाली जगह देखकर वैन खड़ी कर दुकानदारी शुरू कर देते हैं। उनके पास तो पांच वैन हैं जिनपर वह व्यापार कर रहे हैं।