लॉकडाउन में फंसे मेरठ के कारीगर
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अनूप ओझा
प्रयागराज। संत मोरारी बापू की कथा के लिए पंडाल और कॉटेज निर्माण के लिए आए मेरठ के नौ कारपेंटर लॉकडाउन में फंस कर अब भूख से लड़ रहे हैं। तीन दिन से वह शहर के रेलवे स्टेशनों और बस अड्डभनों पर वाहनों की तलाश कर रहे हैं, ताकि घर पहुंच सकें। लेकिन दर-दर भटकने के अलावा कुछ नहीं मिला। उनकी मदद के लिए अबतक न संस्थाएं सामने आई हैं न सरकार। ऐसे में अब भूख से मरने की बजाए पैदल छह सौ किमी का सफर तय कर घर पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। जानी मानी टेंट सेवा प्रदाता कंपनी लल्लू जी एंड संस के के साथ मिलकर संत मोरारी बापू की कथा के लिए जर्मन हैंडर स्टाइल वाले भव्य पंडाल का निर्माण करने वाले मेरठ के कारीगर अब यहां लॉक डाउन में फंसकर मुसीबत के मारे फिर रहे हैं। जीरो रोड बस स्टेशन पर मिले ये कारीगर परिवहन निगम कर्मियों से लेकर राह चलते लोगों से इस मुसीबत से उबरने की दुहाई देते रहे। मेरठ के तारापुरी निवासी नौशाद पुत्र शेर अली ने बताया कि कथा पूरी होने के बाद टेंट व कॉटेज के अलावा अन्य इंतजामों को उखाड़ने और समेटने का भी जिम्मा उन्हीं लोगों पर था। वह टेंट समेट कर जाने वाले ही थे कि तबतक प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस का संक्रमण बढ़ने से रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित कर दिया। तब से वह परेशान हैं। नौशाद के अन्य सहयोगियों में सलमान, तालिब, संजीप, राजू, बब्ू, बिलाल, नाजिम और मोहम्मद सलमान ने बताया कि न जेब में रकम बची है न खानेपीने के सामान ही मिल रहे हैं। शनिवार की सुबह एक वाहन पर कुछ खाने पैकेट बांटे जा रहे थे। लाइन में लगकर पूड़ी-सब्जी के पैकेट लिए, तब जाकर दो दिन बाद थोड़ी राहत मिली। वाहन न चलने से और भी संकट पैदा हो गया है। इन कारीगरों का कहना है कि प्रशासन को इस तरह फंसे लोगों को इस मुसीबत की घड़ी में घर भेजने की व्यवस्था करनी चाहिए। नौशाद व उसके साथियों का कहना था कि अगर कोई वाहन नहीं मिला तो जान बचाने के लिए वह छह सौ किमी का सफर पैदल ही तय करने के लिए मजबूर होंगे।