प्रयागराज। क्रिसमस की पूर्व संध्या से ही यीशु आगमन की खुशियां आरंभ हो जाएंगी। ऑल सेंट्स कैैथिड्रल और सेंट जोसेस कैथिड्रल सहित जमुना चर्च, सेंट पाल्स चर्च, कटरा चर्च, होली टिनिट्री चर्च, सेंट्रल मैथाडिस्ट चर्च आदि में भी प्रार्थनाएं होंगी। शहर के तमाम गिरजाघरों में मिड नाइट सर्विस के तहत मिस्सा बलिदान की विशेष आराधना होगी। मध्य रात्रि को कैरल गायन के बीच यीशु आगमन की खुशियां मनाई जाएंगी। गिरजाघरों को बिजली की झालरों से आकर्षक रूप में सजाया गया है।
मंगलवार को म्योराबाद स्थित सेंट पीटर्स चर्च में रात आठ बजे से बोनफायर के बाद विशेष आराधना होगी। हाईकोर्ट पानी टंकी के करीब सेंट पैट्रिक चर्च में भी विशेष प्रार्थना से पूर्व ‘बोन फायर’ उत्सव मनेगा। पादरी गैब्रियल दाऊद के मुताबिक ऑल सेंट्स कैथिड्रल में रात दस बजे बोन फायर और रात 11 बजे मिडनाइट वर्शिप सर्विस होगी।
वहीं सेंट जोसेफ कैथिड्रल में रात ग्यारह बजे कैरल गायन होगा। पल्ली पुरोहित हेराल्ड ताउरो के मुताबिक रात बारह बजे मिस्सा बलिदान प्रार्थना होगी। लोग एक दूसरे को क्रिसमस की बधाइयां देंगे। बिशप राफी मंजली की मौजूदगी में होने वाली प्रार्थना में पल्ली पुरोहित सहित फादर विकास जैसन, फादर इसीडोर डिसूजा, फादर मनोज डिसूजा, फादर रेजिनाल्ड डिसूजा, फादर विपिन डिसूजा आदि शामिल होंगे।
सेंट जोसेफ में क्रिसमस मेला कल से
प्रयागराज। सेंट जोसेफ स्कूल परिसर में 25 दिसंबर से तीन दिनी क्रिसमस मेला आरंभ होगा। प्रधानाचार्य फादर थामस कुमार के मुताबिक बुधवार को मेले की शुरुआत दिन में एक बजे होगी। तीनों दिन रात दस बजे तक मेले का आनंद लिया जा सकेगा।
मसीहियों में मान्यता, कैंडल
की रोशनी में ही आएगा यीशु
प्रयागराज। क्रिमसस करीब आते ही तरह-तरह के प्रतीक अर्थपूर्ण हो जाते हैं। इसमें क्रिसमस ट्री, कैरल गायन, क्रिसमस तारा, क्रिसमस केक आदि शामिल हैं। इन प्रतीकों के बिना क्रिसमस की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। दरअसल 16वीं शताब्दी में क्त्रिस्समस ट्री का प्रचलन जर्मनी से आरंभ हुआ। वहां के लोग ओक के वृक्ष को सेब और मोमबत्ती से सजाते थे। क्त्रिस्समस ट्री का हरा होना यह दर्शाता है कि यह वृक्ष हर परिस्थिति में संतुष्ट रहता है। इसी प्रकार यदि हमारे मन तथा हमारे हृदय में यीशु मसीह का जन्म होता है, तो हम भी हर परिस्थिति में संतुष्ट रहेंगे और हमें सुखी जीवन मिलेगा।
पादरी उदित सोना कहते हैं, केक मीठा होने के साथ खुशबू से भरा होता है। रोम के गैर मसीही लोग सेटर्न देवता की पूजा मोमबत्ती जला कर करते थे। वे मोमबत्ती के प्रकाश को सेटर्न देवता का प्रकाश मानते थे। लोगों का मानना था कि मोमबत्ती के प्रकाश में बालक यीशु आसानी से घर आ सकेगा। इसी तरह कैरल गीतों के माध्यम से अन्य जाति के लोगों को यीशु मसीह के आगमन का सुसमाचार दिया जाता था।