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मराठे और प्रयागराज : अब तो मराठी रहन-सहन में शामिल इलाहाबादी चलन, कहन

Thu, 17 Jun 2021 07:44 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

  • पर्व-त्योहार, संस्कृति, परंपरा, खान-पान में घुले मिले, नहीं किया जा सकता शहर की पहचान से अलग
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prayagraj news : मराठी संस्कृत (सांकेतिक चित्र)। - फोटो : prayagraj
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विस्तार
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हमारे यहां होली ही नहीं दिवाली पर भी गुझिया बनती है और जब मां गरमागरम गुझिया बनाकर लाईं तो खाकर मजा आ गया। बरबस ही मुंह से निकल पड़ा, ‘अरे अम्मा का चउचक गुझिया बनाई हो’, हमरे लिए रख दियो, हम उहौं लै जाब। यह कहना है पार्क रोड पर रहने वाली अवंतिका यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ डिजाइन में लिबरल आर्टस एवं संगीत की असिस्टेंट प्रोफेसर और स्टूडेंट्स अफेयर की कोआर्डिनेटर डॉ.संयुक्ता कशालकर का, जो मानती हैं, मैं इलाहाबाद से बाहर जा सकती हूं, मेरे दिल से इलाहाबाद बाहर नहीं जा सकता।

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सैकड़ों किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के अलग-अलग जिलों, अंचलों से आकर दारागंज, कीडगंज सहित शहर के विभिन्न मोहल्लों में बसे मराठी समाज के लोगों ने अपनी संस्कृति, त्योहार, परंपरा, रहन-सहन, खान-पान सभी को ज्यों का त्यों संजोकर रखा है। लेकिन, धीरे-धीरे करके उन पर, खासकर मौजूदा युवा पीढ़ी पर ऐसा इलाहाबादी रंग चढ़ा है कि उन्हें शहर की पहचान से अलग किया ही नहीं जा सकता है। सिर्फ दस दिवसीय सार्वजनिक गणेशोत्सव ही नहीं होली, दिवाली, दशहरा, नागपंचमी, तीज, संक्रांति, रंगभरी एकादशी से लेकर वट सावित्री हो या फिर तुलसी-शालिग्राम विवाह सभी त्योहारों में पूरे उत्साह केसाथ उनका जुड़ाव है।

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prayagraj news : मराठी संस्कृत (सांकेतिक चित्र)। - फोटो : prayagraj
डॉ.संयुक्ता कशालकर बोलीं, यूनिवर्सिटी या मोहल्ले की सहेलियों के संग इलाहाबादी अंदाज में पूरी मस्ती होती है। नाटक के रिहर्सल केदौरान लोकनाथ या फिर अशोक नगर के समोसे हम उसी चाव से खाते और जमकर होली भी खेलती हूं। दिवाली के दिन निश्चित रूप से हनुमान मंदिर जाती और भोग चढ़ाती हूं। महाराष्ट्र से आने वाले रिश्तेदारों को संगम स्नान के बाद पूरनपोली नहीं लोकनाथ की दमआलू-कचौड़ी या हीरा की दही-जलेबी खिलाती हूं। इलाहाबादी आतिथ्य उन्हें चकित करता और यहां से जुड़ी भ्रांतियों को दूर करता है। मैं जहां भी गई, मैंने अपने इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व किया।

दारागंज की रहने वाली रेल मंत्रालय के उपक्रम डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कार्पोरेशन की महाप्रबंधक वित्त अपर्णा धर्माधिकारी ने जोड़ा, हम मराठी परंपरा और संस्कृति के साथ ही सौ फीसदी इलाहाबादी हो गए हैं। गुड़िया का मेला हो या सावन, नागवासुकि से लेकर मनकामेश्वर तक जाती रही। पूरनपोली, श्रीखंड के साथ होली में गुझिया तो दिवाली में सूरन की सब्जी बनती रही। मित्रों के बीच पिता जी भी दारागंज का दोहरा या होली पर भांग की गोली ले लेते थे। चैत्र नवरात्रि और संक्रांति पर हल्दी-कुमकुम पर्व में पास-पड़ोस की सभी महिलाएं जुटतीं। मां के साथ ठाकुर प्रसाद की गली में वट सावित्री की पूजा या नागवासुकि के गुड़िया के मेले में जाना अब तक याद है। कार्तिक एकादशी को गन्ने का मंडप बनाकर शालिग्राम-तुलसी विवाह उत्सव मनाने से पहले मां सुंदर रंगोली बनाती रहीं। गणेश चतुर्थी और महालक्ष्मी पूजन में कुम्हारिन मुखौटे दे जाती थीं। हम आज भी गीतों के बीच उत्सव मनाते हैं।
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prayagraj news : मराठी संस्कृत (सांकेतिक चित्र)। - फोटो : prayagraj
कच्चा वाड़ा में रहने वाले मनोज गोरे बोले, अपने दारागंज के समाज में हम घुलेमिले हैं। भाषा, बोली, परंपरा या रीति रिवाज, त्योहार सभी साथ मिलकर मनाते हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सव में जितनी तैयारी और भागीदारी होती है, दारागंज के कालीस्वांग और रामलीला उत्सवों में भी उतने ही उत्साह से शामिल होते हैं। बचपन से ही दारागंज के मशहूर काली स्वांग को देखने की जो ललक थी, अब भी वैसी ही है। फाइनेंस कंपनी से जुड़े दीपक बी खेर ने जोड़ा, महाराष्ट्र से आने वाले रिश्तेदारों को छोड़कर यहां घर-परिवार के सदस्यों, दोस्तों से इलाहाबादी अंदाज में ही बातचीत होती है। साथ मिलकर ही पर्व-उत्सव की तैयारियां करते हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ फू़ड टेक्नालॉजी की कोर्स कोआर्डिनेटर विनीता पुराणिक, परिमाला आचार्य, स्मिता पुराणिक, इलाहाबाद संग्रहालय के सहायक संग्रहपाल ओए वानखेड़े, गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक के प्रधानाचार्य अशोक पुराणिक,  योगेश पित्रे ने भी कहा, बोलचाल, खान-पान और रहन-सहन में आज हम इलाहाबादी संस्कृति से ऐसे मिलजुल गए हैं कि हमें शहर की पहचान से अलग किया ही नहीं जा सकता है। अब तो शादी में भी मराठी-गैरमराठी का बंधन नहीं रहा। अनेक मराठी परिवारों ने गैर मराठी परिवारोें से रिश्ता-नाता जोड़ा है। -अनिल सिद्धार्थ
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