प्रदेश सरकार ने इस बार दिव्य और भव्य कुंभ का नारा दिया है। इसके विपरीत विदेशी राजनयिकों को दिखाने के लिए बनी फिल्म और प्रदर्शनी से उसकी दिव्यता गायब रही। भव्यता और प्रबंधन पर अधिक जोर रहा। फिल्म के ज्यादातर हिस्से में कुंभ की तैयारियों को दिखाया गया। जबकि, नेपाल, श्रीलंका, भूटान समेत कई देश के राजनयिकों में यह जानने की जिज्ञासा रही कि करोड़ों लोग आखिर किसके आमंत्रण पर चले आते हैं तथा इसका अध्यात्मिक महत्व क्या है।
संगम क्षेत्र में वीआईपी घाट पर बने भव्य पांडाल में आयोजित कार्यक्रम में राजनयिकों को नौ मिनट की फिल्म दिखाई गई। इसमें कुंभ का पूरा सफर दिखाया गया। बीच-बीच में इसके धार्मिक महत्व का जिक्र रहा लेकिन, अधिक जोर मेला प्रबंधन पर रहा। मेला का क्षेत्रफल, लाइटिंग, शौचालयों की संख्या, सुरक्षा, बसों, ई-रिक्शा, अस्पताल, थाना आदि के बारे में विस्तार से बताया गया। आयोजन से जुड़े एक भारतीय प्रतिनिधि का कहना था कि कुंभ को चार भागों- अध्यामिक परिकल्पना, प्रबंधन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भागीदारी में देखा जाता है। फिल्म में प्रबंधन और अर्थव्यवस्था के पहलू पर तो विस्तार से चर्चा हुई लेकिन आध्यात्मिक पक्ष नहीं दिखा। अच्छा होता कि इसके लिए किसी वक्ता को बुला लिया जाता। उनका कहना था कि यह पूरा आयोजन सरकारी बन कर रह गया। यही स्थिति प्रदर्शनी को लेकर भी रही और कुंभ की तैयारियों को दिखाने पर ज्यादा जोर रहा।
राजनयिकों के स्वागत के दौरान बमरौली एयरपोर्ट से संगम तक भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को दिखाने की भी तैयारी थी। इसके तहत घोषणा की गई थी कि राजनयिकों के स्वागत में एकलव्य चौराहा से बालसन तक सड़क के किनारे खड़े होने वाले स्कूली बच्चे अलग-अलग प्रदेश के परिधान में होंगे। तय हुआ था बच्चे झांकी भी दिखाएंगे लेकिन ज्यादातर बच्चे स्कूल की ड्रेस में रहे। संगम तट पर भी सिर्फ सरस्वती वंदना तक कार्यक्रम सीमित