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गज़लों में सामाजिक समस्याएं भी हुईं शुमार

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Majrooh Sultanpuri - फोटो : CITY DESK
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हिंदुस्तानी एकेडेमी में ‘मज़रूह सुल्तानपुरी-हयात व ख़िदमात’ विषयक संगोष्ठी
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प्रयागराज। हिंदुस्तानी एकेडेमी की ओर से बुधवार को शायर मज़रूह सुल्तानपुरी की याद में ‘मज़रूह सुल्तानपुरी-हयात व ख़िदमात’ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गई। विषय प्रवर्तन करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय उर्दू विभाग के डॉ. फाजिल अहसन हाशमी ने कहा कि मजरूह ने सामाजिक समस्याओं को भी गजलों के अंदाज में पेश किया। सन 1941 में मजीदिया इस्लामिया इंटर कालेज के मुशायरे में आए और अपनी मशहूर गज़ल ‘आ निकल के मैदां में दो रूखी के खाने से काम चल नहीं सकता, अब किसी बहाने से’ सुनाई। उनके यहाँ मोहब्बत, शराफत और सदाकत के साथ जुर्रत और हिम्मत भी थी। उन्होंने बहुत सलीके के साथ जमाने का शिकवा किया।
प्रो.शबनम हमीद ने कहा कि मजरूह सुल्तानपुरी फ़िक्त्रस्ी एतबार से तरक्क़ी पसंद शायर थे। उन्होंने नए प्रयोग करते हुए समाज में ऐतिहासिक विरासत को कथा एवं कृति के माध्यम से प्रस्तुत किया। फज्ले हसनैन ने कहा कि मजरूह सुल्तानपुरी निहायक खु़दार और बेबाक थे। उसूलों से समझौता करना उन्हें मंजूर नहीं था। विश्वविद्यालय के शोध छात्र मोहम्मद रेहान ने तरक्की पसंद गज़ल और मजरूह सुल्तानपुरी‘ विषय पर शोधपत्र पढ़ा। एकेडेमी के अध्यक्ष डॉ.उदय प्रताप सिंह ने कहा कि मजरूह सुल्तानपुरी एक राष्ट्रवादी शायर थे। उन्हें हिन्दुस्तानी समाज की बारीकियों को उकेरने में महारत हासिल थी। शताब्दी वर्ष पर उन्हें याद करना, भारत को याद करना है।
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एकेडेमी के सचिव रवीन्द्र कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। एकेडेमी के काषाध्यक्ष रविनंदन सिंह की ओर से संपादित पुस्तक ‘हिंदुस्तानी एकेडेमी के परिसंवाद’ लोकार्पण किया गया। एकेडेमी के कोषाध्यक्ष रविनन्दन सिंह ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। एकेडेमी सभागार में हुए कार्यक्रम में हरिमोहन मालवीय, राम नरेश तिवारी ‘पिण्डीवासा’,डॉ. सभापति मिश्र, डॉ. विद्याकान्त तिवारी, डॉ. पूर्णिमा मालवीय, डॉ शान्ति चौधरी, प्रदीप तिवारी, डॉ.अनिल कुमार सिंह आदि मौजूद थे।
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