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गांधी की राजनीति आचरण की राजनीति थी

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Mahatma Gandhi - फोटो : CITY DESK
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निराला सभागार में व्याख्यानमाला के दौरान बोले आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह
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प्रयागराज। ‘गांधी : आचरण की राजनीति’ विषय पर बोलते हुए आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि गांधी की राजनीति आचरण की राजनीति थी। यह उनके आचरण का ही प्रभाव था जिसने प्रिंस नेहरू को भी बदल कर रख दिया। गांधी ने जितना चंपारण को बनाया, चंपारण ने भी उन्हें उतना ही बनाया।
केंद्रीय सांस्कृतिक समिति एवं गांधी भवन इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से गांधी सप्ताह के अंतर्गत बुधवार को निराला सभागार में ‘गांधी : आचरण की राजनीति’ विषय पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय से आए आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि यह चंपारण का ही प्रभाव था कि गांधी चंपारण आए तो थे महज कुछ दिनों के ही लिए मगर वह यहां कई महीने रह गए। गांधी जब चंपारण गए तो वह पगड़ी, कुर्ता और धोती में, लेकिन वहां ही उन्होंने सबकुछ त्याग दिया और केवल एक धोती के दो टुकड़े करके उसे लपेट लिया। गांधी के जितने भी विचार थे वह असल में आचरण के विचार थे। यह उनके आचरण का ही प्रभाव था कि जब उन पर केस होता है तो जज भी उनके प्रभाव से अछूता नहीं रहता और कह बैठता कि यदि आपकी सजा को माफ कर दिया जाय तो सबसे अधिक खुशी मुझे होगी।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे गांधी भवन के निदेशक प्रो. वीके राय ने कहा कि गांधी ने दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदला। गांधी की खोज असल में मानव में मानव की खोज थी। केंद्रीय सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष प्रो. संतोष भदौरिया ने स्वागत किया। संचालन डॉ. कुमार वीरेंद्र ने किया। इस दौरान हिंदी विभाग के सभी शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
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गांधीजी ने राम के आचरण से ‘अभय’ को धारण किया
प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा, ‘राम’ से ‘भय’ भी पैदा होता है और ‘अभय’ भी। गांधी ने अपने आचरण में ‘अभय’ को लिया। गांधी जनसंपर्क को बहुत महत्व देते थे। उन्होंने कभी भी दूसरों के माध्यम से या रिपोर्ट के माध्यम से लोगों का हाल नहीं जाना। साथ ही वे संवाद को भी खूब महत्व देते थे, उनके और आंबेडकर के बीच काफी संवाद हुए। कहीं न कहीं गांधी जी की हरिजनों के प्रति सोच आंबेडकर से संवाद से ही मिली। टैगोर और गांधी के साहित्य नैतिक हैं, उनका साहित्य आचरण से परिपूर्ण है।
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