Mahapran Nirala reached across the seven seas
प्रयागराज। वसंत पंचमी और महाप्राण निराला एक दूसरे के पर्याय हैं। इसीलिए वसंत पंचमी की दस्तक के साथ ही एक बार फिर महाप्राण की चर्चा प्रासंगिक हो उठी है। दारागंज स्थित महाप्राण के प्रतिमा स्थल का रखरखाव तक हम भले ही यथोचित तरीके से नहीं कर पा रहे हैं लेकिन हिंदी की दुनिया के महाप्राण बने निराला का डंका सात समंदर पार भी बज रहा है।
उनकी रचना कुल्लीभाट का अनुवाद अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सत्ती खन्ना ने किया है। वह निराला पर शोध के साथ ही उनकी अन्य रचनाओं का भी अनुवाद कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में लारा स्पिनी ने कई दिनों पूर्व ‘भारत में महामारी’ पर एक प्रोजेक्ट के तहत 1918 में भारत में महामारी के चलते निराला की पत्नी मनोहरा देवी और परिवार के अन्य भाइयों की मृत्यु पर निराला के गद्य के प्रसंगों को ही विशेष रूप से प्रस्तुत किया था।
महाप्राण निराला के पौत्र विवेक निराला कहते हैं, दिल्ली के उप राज्यपाल रहे तेजिन्दर खन्ना के भाई सत्ती खन्ना कुल्लीभाट के अनुवाद के सिलसिले में चार बार भारत आए। इस दौरान वह निराला के पैतृक गांव उन्नाव में गढ़ाकोला और रायबरेली में निराला जी की ससुराल डलमऊ सहित लखनऊ भी गए। निराला को लेकर उनके मन में नए सपने हैं, उम्मीद है उनका काम पूरा होगा तो निराला एक और नए रूप में पाठकों से मुखातिब होंगे।वहीं मध्यप्रदेश के रतन चौहान भी निराला की कई कविताओं का अनुवाद कर चुके हैं जो राजकमल प्रकाशन से जल्द ही पुस्तक रूप में पाठकों के सामने होगा।