महाकुंभ में पहुंचे विदेशी श्रद्धालु।
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हादसे के बाद भी नहीं डिगा उत्साह
यही धारणा संगम पर जन ज्वार के रूप में दिन रात उफना रही है। बिहार के रोहतास स्थित परछा गांव से अपनी मां को कुंभ स्नान कराने आए भूषण चंद्र चौबे बुधवार की रात संगम नोज पर हुए हादसे के समय घिर गए थे। बिना स्नान किए रात को किसी तरह वहां से सुरक्षित सेक्टर 18 के अपने शिविर में मां को लेकर वापस आए। बृहस्पतिवार को वह संगम नोज पर उसी जगह वह फिर अपनी मां सुनयना देवी को लेकर स्नान कराने पहुंचे।
त्रिवेणी की पावन धारा में डुबकी लगाकर दोनों मां-बेटा धन्य हो उठे। उनका कहना था कि वह यहां किसी चमक दमक, बसावट या बाहरी व्यवस्था को देखने नहीं आए हैं। संगम की महिमा ही सनातन संस्कृति का गौरव है। वह कहते हैं कि कुंभ मनुष्य के अंतर्मन की चेतना का नाम है। यह चेतना स्वत: जागृत होती है। यही चेतना भारत के कोने-कोने से लोगों को संगम तट तक खींच लाती है।
पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के साधु-संत अमृत स्नान करते हुए।
एकता का है महाकुंभ
गांव, कस्बों, शहरों से लोग तीर्थराज की त्रिवेणी की ओर निकल पड़ते हैं। सामूहिकता की ऐसी शक्ति, ऐसा समागम शायद ही कहीं और देखने को मिले। यहां आकर संत-महंत, ऋषि-मुनि, ज्ञानी-विद्वान, सामान्य जन सब एक हो जाते हैं। सब एक साथ त्रिवेणी में डुबकी लगा रहे हैं। यहां जातियों का भेद खत्म हो जाता है, संप्रदायों का टकराव मिट जाता है। करोड़ों लोग एक ध्येय, एक विचार से जुड़ जाते हैं।
इसी तरह कनाडा से क्रियायोग आश्रम के शिविर में पहुंचकर कल्पवास कर रहीं श्रीमा मालिनी, डेविन, लिंडा गैल कहती हैं कि महाकुंभ के दौरान यहां अलग-अलग राज्यों से करोड़ों लोग जुटे हुए हैं। उनकी भाषा अलग है, जातियां अलग हैं। मान्यताएं अलग है, लेकिन संगम नगरी में आकर वो सब एक हो गए हैं और इसलिए महाकुंभ एकता का महायज्ञ बन गया है। इसमें हर तरह के भेदभाव की आहुति दे दी जाती है। यहां संगम में डुबकी लगाने वाला हर भारतीय एक भारत-श्रेष्ठ भारत की अद्भुत तस्वीर प्रस्तुत कर रहा है।