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भाई-चारे का महाकुंभ : बर्फीली ठंड में भीगते श्रद्धालुओं के लिए रकीब चाचा ने खोल दिया था मकान

Sat, 07 Dec 2024 12:35 PM IST
विनोद सिंह शाश्वत, संवाद न्यूज एजेंसी झूंसी (प्रयागराज)

सार

महाकुंभ में सद्भभाव की बारिश के किस्से अंतहीन हैं। लेकिन, कुछ साधु-संतों की ओर से मुस्लिमों के महाकुंभ में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग से झूंसी में गंगा किनारे बसे परिवार आहत हैं। महाकुंभ की संस्कृति में रचे-बसे इन परिवारों में मेले को लेकर अलग ही उत्साह दिखाई देता है।
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महाकुंभ को लेकर गुफ्तगु करते गंगातट के किनारे बसे मुसलिम परिवार के बुजुर्ग। - फोटो : संवाद।
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विस्तार
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बात 1978 के महाकुंभ की है। बर्फीली सर्दियों के बीच मौनी अमावस्या के आसपास कई दिन मूसलाधार बारिश हुई। संतों के पंडाल तक पानी भर गया। श्रद्धालुओं के छुपने की भी जगह न थी। कुंभ संस्कृति में पले-बढ़े युवा रकीब खान ने घर का एक तल खाली करा दिया। वो दौर याद कर आज रकीब चाचा (69) भावुक हो उठते हैं।

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महाकुंभ में सद्भभाव की बारिश के किस्से अंतहीन हैं। लेकिन, कुछ साधु-संतों की ओर से मुस्लिमों के महाकुंभ में प्रवेश पर रोक लगाने की मांग से झूंसी में गंगा किनारे बसे परिवार आहत हैं। महाकुंभ की संस्कृति में रचे-बसे इन परिवारों में मेले को लेकर अलग ही उत्साह दिखाई देता है। यह लोग महाकुंभ के दौरान देश के कोने-कोने से आए लाखों श्रद्धालुओं की दशकों से सेवा करते रहे हैं।

तैयारी इस बार भी यही है। इनका कहना है कि हम तो अमन-चैन और गंगा-जमुनी तहजीब का पैगाम देते आए हैं क्योंकि कुंभ मेले में हमारी भी पूरी आस्था है। झूंसी से सटे गांव कोहना निवासी कपड़ा व्यापारी रकीब खान 1978 के महाकुंभ में भाई-चारे का किस्सा सुनाते हुए भावुक हो उठते हैं।

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बताते हैं, मौनी अमावस्या पर मूसलाधार बारिश हुई थी। साधु-संतों के शिविरों तक पानी भर गया था। देशभर से आए श्रद्धालुओं के पास बचने की कोई जगह न थी। बात अब्बा तक पहुंचाई तो उन्होंने तुरंत मकान का निचला हिस्सा खुलवा दिया। श्रद्धालुओं के लिए खाने-पीने का इंतजाम भी किया। बदले में हमें खूब दुआएं मिलीं।

सेवानिवृत्त शिक्षक एखलाक हुसैन (73) भी यादों के पन्ने उलटते हैं। कहते हैं, बचपन में दोस्तों के साथ साधु-संतों के शिविरों में रोजाना ही भंडारा खाते थे। शाम को घंटों मेला घूमते। यहीं के अतीक अहमद लालू (70) और शमीम ठाकुर (65) कहते हैं, तब साधु-संत प्रेम और सद्भभाव के साथ पास बैठाते थे। अब दूर भगाने बातें हो रही हैं।
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मुस्लिम समाज के लोगों ने की थी अंत्येष्टि

झूंसी। रकीब चाचा और एखलाक हुसैन बताते हैं कि 1978 के महाकुंभ में ठंड लगने से बस्ती के एक मकान में ठहरे श्रद्धालु की मौत हो गई थी। सूचना कुंभ मेला प्रशासन को दी गई, लेकिन कोई आया नहीं। फिर, बस्ती के लोगों ने ही छतनाग घाट पर श्रद्धालु की अंत्येष्टि की थी।

मेंहदी हसन के घर सपरिवार रुकते थे बिहार के ब्रजलाल

झूंसी। कोहना निवासी खुर्शीद मियां बताते हैं कि बिहार के सासाराम जिले के श्रद्धालु ब्रजलाल कुंभ-महाकुंभ या माघ मेले के बहाने हर साल प्रयागराज आते थे। वे संगम की रेती पर बने शिविरों में नहीं, बल्कि गांव के मेहंदी हसन के घर पर सपरिवार रुका करते थे। 2009 में मेहंदी हसन के इंतकाल से पहले तक यही सिलसिला चला।
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