बताते हैं, मौनी अमावस्या पर मूसलाधार बारिश हुई थी। साधु-संतों के शिविरों तक पानी भर गया था। देशभर से आए श्रद्धालुओं के पास बचने की कोई जगह न थी। बात अब्बा तक पहुंचाई तो उन्होंने तुरंत मकान का निचला हिस्सा खुलवा दिया। श्रद्धालुओं के लिए खाने-पीने का इंतजाम भी किया। बदले में हमें खूब दुआएं मिलीं।
सेवानिवृत्त शिक्षक एखलाक हुसैन (73) भी यादों के पन्ने उलटते हैं। कहते हैं, बचपन में दोस्तों के साथ साधु-संतों के शिविरों में रोजाना ही भंडारा खाते थे। शाम को घंटों मेला घूमते। यहीं के अतीक अहमद लालू (70) और शमीम ठाकुर (65) कहते हैं, तब साधु-संत प्रेम और सद्भभाव के साथ पास बैठाते थे। अब दूर भगाने बातें हो रही हैं।
मुस्लिम समाज के लोगों ने की थी अंत्येष्टि
झूंसी। रकीब चाचा और एखलाक हुसैन बताते हैं कि 1978 के महाकुंभ में ठंड लगने से बस्ती के एक मकान में ठहरे श्रद्धालु की मौत हो गई थी। सूचना कुंभ मेला प्रशासन को दी गई, लेकिन कोई आया नहीं। फिर, बस्ती के लोगों ने ही छतनाग घाट पर श्रद्धालु की अंत्येष्टि की थी।
मेंहदी हसन के घर सपरिवार रुकते थे बिहार के ब्रजलाल
झूंसी। कोहना निवासी खुर्शीद मियां बताते हैं कि बिहार के सासाराम जिले के श्रद्धालु ब्रजलाल कुंभ-महाकुंभ या माघ मेले के बहाने हर साल प्रयागराज आते थे। वे संगम की रेती पर बने शिविरों में नहीं, बल्कि गांव के मेहंदी हसन के घर पर सपरिवार रुका करते थे। 2009 में मेहंदी हसन के इंतकाल से पहले तक यही सिलसिला चला।