संगमनगरी जपतप और दान-पुण्य के लिए जानी जाती है। 13 जनवरी से महाकुंभ स्नान पर्व शुरू हो जाएगा। इससे पहले जहां एक ओर साधु-संत शाही स्नान करने के लिए बेताब हैं। वहीं, कुरुक्षेत्र से जंगम जाति के संत भी संगम पहुंच गए हैं। सिर पर सजे नाग और मोर मुकुट उन्हें अन्य साधु-संतों से अलग करते हैं। महाकुंभ के दौरान ये संत शिव-पार्वती के विवाह की कथा सुनाकर लोगों से भिक्षा मांगते हैं।
कुरुक्षेत्र से आए सोम गिरि बाबा बताते हैं वह जूना अखाड़े के संन्यासी हैं। वह जंगम जाति से आते हैं। उनके साथ करीब 50 लोग संगम आए हैं। वह लोग भगवान शंकर और पार्वती के विवाह की कथा लोगों को सुनाते हैं। उसके बदले में उनसे एक टल्ली दान लेते हैं।
बाबा ने टल्ली के मतलब को समझाते हुए कहा कि, टल्ली शंकर जी की सवारी नंदी बैल के गले की घंटी है, जिसे वह लोग अपने पास भिक्षा मांगने के लिए पात्र के रूप में रखते हैं। इसमें करीब 150 ग्राम अनाज आता है। खास बात यह है कि यह लोग एक व्यक्ति से सिर्फ एक ही टल्ली भिक्षा लेते हैं।
शेषनाग और मोर मुकुट है पहचान
बाबा सोम गिरि अपने सिर पर सजे शेषनाग और मोर मुकुट के बारे में बताते हैं कि यह उनकी जाति की पहचान है। शेषनाग भगवान शंकर का दिया हुआ है। इसके साथ विष्णु भगवान की कलंगी है और कान में माता पार्वती के कर्ण फूल हैं। बाबा का दावा है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने उन्हें अपना पुरोहित माना था और आशीर्वाद दिया था कि जा रे जंगम तू शिव के नाम का जप करके दुनिया में उनका गुणगान करेगा। तभी से उनकी जाति के लोग शिव और पार्वती की महिमा की कथा सुनाकर भिक्षा मांगने लगे।